गोपीनाथ आमार से एक - इ अङ्ग हय ।
इँहाके चन्दन दिले हबे मोर ताप - क्षय ॥160॥
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अनुवाद
"मेरे शरीर और गोपीनाथ के शरीर में कोई अंतर नहीं है। वे एक ही हैं। इसलिए यदि आप गोपीनाथ के शरीर पर चंदन का लेप लगाएँगे, तो स्वाभाविक रूप से आप इसे मेरे शरीर पर भी लगाएँगे। इस प्रकार मेरे शरीर का तापमान कम हो जाएगा।"
"There is no difference between my body and Gopinath's body. They are inseparable. Therefore, if you apply sandalwood paste to Gopinath's body, it is the same as applying it to my body. This way, my body temperature will decrease."
तात्पर्य
गुपाल वृन्दावन में स्थित था जो कि रेमुणा से बहुत दूर था। उन दिनों किसी को भी मुसलमानों द्वारा शासित प्रांतों से होकर गुज़रना पड़ता था, जो कई बार यात्रियों को रोकते थे। अपने भक्त की मुश्किल को देखते हुए, प्रभु गुपाल, अपने भक्तों के सबसे बड़े हितेषी, ने माधवेंद्र पुरी को गोपीनाथ के शरीर पर चंदन का लेप लगाने का आदेश दिया, जो कि गुपाल के शरीर से भिन्न नहीं था। इस तरह प्रभु ने माधवेंद्र पुरी को मुश्किलों और असुविधा से मुक्त किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥