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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.4.137 
प्रेम देखि’ सेवक कहे हइया विस्मित ।
कृष्ण ने इँहार वश, - हय यथोचित ॥137॥
 
 
अनुवाद
माधवेंद्र पुरी में प्रकट हुए प्रेममय लक्षणों को देखकर, पुजारी आश्चर्यचकित रह गए। वह समझ गए कि कृष्ण उनके प्रति इतने कृतज्ञ क्यों थे, और उन्होंने देखा कि कृष्ण का यह कार्य उचित ही था।
 
The priest was astonished to see Srila Madhavendra Puri's signs of love. He understood why Krishna was so grateful to him and saw that Krishna's action was appropriate.
तात्पर्य
भक्त कृष्ण को पूर्णतया अपने नियन्त्रण में ला सकता है। इसे श्रीमद्भागवतम (१०.१४.३) में समझाया गया है: अजित जितो ऽपि असि तैस्त्रिलोक्याम्. कृष्ण को कभी किसी ने नहीं जीता है, परंतु एक भक्त उन्हें भक्ति-सेवा द्वारा जीत सकता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता (५.३३) में बताया गया है: वेदेषु दुर्लभम अदुर्लभं आत्म-भक्तौ. कोई केवल वैदिक साहित्य पढ़कर कृष्ण को नहीं समझ सकता है। यद्यपि सारा वैदिक साहित्य कृष्ण को समझने के लिए है, कृष्ण-प्रेमी बने बिना कोई कृष्ण को समझ नहीं सकता है। इसलिए वैदिक साहित्य (स्वाध्याय) पढ़ने के साथ, व्यक्ति को देवता की भक्तिमय आराधना (अर्चन-विधि) में रत होना चाहिए। ये दोनों मिलकर भक्त की भक्ति-सेवा की अलौकिक समझ को बढ़ाएंगे। श्रवणादि शुद्ध-चित्ते करये उदय (चै.मध्य २२.१०७). ईश्वरप्रेम हर किसी के हृदय में निद्रित होता है और यदि कोई निष्ठापूर्वक भक्ति-सेवा की प्रक्रिया का पालन करता है, तो वह जाग्रत हो जाता है। किंतु मूर्ख सांसारिक लोग जो केवल कृष्ण के बारे में पढ़ते हैं, गलती से यह सोचते हैं कि वह अनैतिक या अपराधी हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)