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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  2.4.135 
एत शुनि’ पुरी - गोसाञि परिचय दिल ।
क्षीर दिया पूजारी ताँरे दण्डवत् हैल ॥135॥
 
 
अनुवाद
यह निमंत्रण सुनकर माधवेंद्र पुरी बाहर आए और अपना परिचय दिया। पुजारी ने मीठे चावल का बर्तन आगे बढ़ाया और उनके आगे गिरकर प्रणाम किया।
 
Upon hearing this invitation, Madhavendra Puri came forward and introduced himself. The priest then handed him the bowl of kheer and bowed down to him.
तात्पर्य
ब्राह्मण को चाहिए कि वह किसी के सामने भी पूरी तरह से दण्डवत् करके प्रणाम न करे क्योंकि ब्राह्मण को उच्चतम वर्ण का माना जाता है। परन्तु जब कोई ब्राह्मण किसी भक्त को देखता है तो वह उसे दण्डवत् करता है। इस ब्राह्मण पुजारी ने माधवेंद्र पुरी से नहीं पूछा कि वह ब्राह्मण हैं या नहीं, परंतु जब उसने देखा कि माधवेंद्र पुरी वास्तव में इतने उच्च भक्त हैं कि कृष्ण उनके लिए चोरी भी कर सकते हैं, तो उसने तुरंत उस संत की स्थिति समझ ली। जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है: किबा विप्र, किबा न्यासी, शूद्र केने नया/ येइ कृष्ण-तत्त्व-वित्ता, सेई ’गुरु’ हया। (चै. च. मध्य 8.128) यदि ब्राह्मण पुजारी साधारण ब्राह्मण होता, तो गोपीनाथ ने उससे स्वप्न में बात नहीं की होती। क्योंकि देवता ने माधवेंद्र पुरी और ब्राह्मण पुजारी दोनों से स्वप्न में बात की, तो व्यावहारिक रूप से वे एक ही स्तर पर थे। परन्तु क्योंकि माधवेंद्र पुरी एक वरिष्ठ संन्यासी वैष्णव थे, एक परमहंस थे, इसलिए पुजारी तुरंत उनके सामने दण्डवत् हो गया और साष्टांग प्रणाम किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)