न माम दुष्कृतीनो मूढाः प्रपद्यंते नराधमाः
मायापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः
"वे दुष्ट जो मूर्ख हैं, जो मनुष्य जाति में सबसे नीच हैं, जिनका ज्ञान भ्रम से चुराया गया है, और जो राक्षसों के नास्तिक स्वभाव में भाग लेते हैं, वे मेरे प्रति समर्पण नहीं करते हैं।" (Bg. 7.15)
सांसारिक बदमाश यह नहीं समझ सकते कि कृष्ण जो कुछ भी करते हैं, स्वभाव से निरपेक्ष होने के कारण, सब अच्छा है। भगवान के इस गुण को श्रीमद-भागवतम (10.33.29) में समझाया गया है। सांसारिक गणना से कोई व्यक्ति सर्वोच्च शक्तिशाली व्यक्ति के कुछ कार्यों को अनैतिक मान सकता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। उदाहरण के लिए, सूर्य पृथ्वी की सतह से पानी सोखता है, लेकिन यह केवल समुद्र से पानी नहीं सोखता है। यह मूत्र और अन्य अशुद्ध पदार्थों से युक्त गंदी नालियों और नालों से भी पानी सोखता है। इस तरह के पानी को सोखने से सूर्य प्रदूषित नहीं होता है। बल्कि सूर्य गंदी जगह को शुद्ध बना देता है। यदि कोई भक्त किसी अनैतिक या अनुचित उद्देश्य से भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के पास जाता है, तो भी वह शुद्ध हो जाता है; भगवान संक्रमित नहीं होते। श्रीमद-भागवतम (10.29.15) में कहा गया है कि यदि कोई सर्वोच्च प्रभु से वासना, क्रोध या भय (काम क्रोध भयम) में भी संपर्क करता है, तो वह शुद्ध हो जाता है। गोपियाँ युवा लड़कियाँ होने के कारण कृष्ण के पास इसलिए आईं क्योंकि वे एक सुंदर युवा लड़के थे। बाहरी दृष्टिकोण से, वे कामना से प्रभु के पास गईं, और प्रभु ने मध्यरात्रि में उनके साथ नृत्य किया। सांसारिक दृष्टिकोण से, ये क्रियाएँ अनैतिक प्रतीत हो सकती हैं क्योंकि एक विवाहित या अविवाहित युवती घर छोड़कर किसी युवक के साथ मिलकर उसके साथ नृत्य नहीं कर सकती। हालाँकि यह सांसारिक दृष्टिकोण से अनैतिक है, लेकिन गोपियों की गतिविधियों को पूजा के सर्वोच्च रूप के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि यह भगवान कृष्ण ही थे जिनके वे मृत रात्रि में वासनापूर्ण इच्छाओं के साथ संपर्क में थे।
किंतु ये बातें अनन्य भक्तों के लिए ही समझ में आ सकती हैं। कृष्ण को तो तत्व रूप से समझना होगा। साधरण बुद्धि से विचार करना चाहिए कि अगर केवल कृष्ण के पवित्र नाम के उच्चारण मात्र से ही शुद्धि होती है, तो फिर स्वयं श्रीकृष्ण कैसे अनैतिक हो सकते हैं? दुर्भाग्यवश, सांसारिक मूर्खों को शिक्षा जगत का नेता मान लिया गया है और उन्हें सामान्य जनता में अधर्म के सिद्धांतों को शिक्षित करने के लिए ऊंचे पद दिए गए हैं। इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवतम ( 7.5.31 ) में की गई है: अंधा यथांधैर उपनीयमानाह। नेत्रहीन नेत्रहीनों का नेतृत्व करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे दुष्टों की अपरिपक्व समझ के कारण, सामान्य लोगों को कृष्ण के गोपियों के साथ घटित हुए आनंद को लेकर चर्चा नहीं करनी चाहिए। एक अनन्य भक्त को उनके भक्तों के लिए मीठा चावल चुराने को लेकर हुई चर्चा भी नहीं करनी चाहिए। यह चेतावनी है कि हमें इन चीजों के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। यद्यपि कृष्ण तो पवित्रों में सबसे पवित्र हैं, सांसारिक लोग, कृष्ण के आनंदों के बारे में सोचकर, जो अनैतिक प्रतीत होते हैं, स्वयं दूषित हो जाते हैं। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने कभी सार्वजनिक रूप से गोपियों के साथ कृष्ण के संबंधों पर चर्चा नहीं की। वह इन संबंधों पर केवल तीनों करीबी दोस्तों के साथ ही चर्चा करते थे। उन्होंने कभी भी रासलीला की सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं की। जैसे पेशेवर पाठक करते हैं, यद्यपि उन्हें कृष्ण या दर्शकों की प्रकृति की समझ नहीं होती है। हालाँकि, श्री चैतन्य महाप्रभु ने जितना हो सके उतने घंटों तक विशाल पैमाने पर हरिनाम संकीर्तन को प्रोत्साहित किया।
