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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  2.4.133 
क्षीर लह एइ, यार नाम ‘माधव - पुरी’ ।
तोमा ला गि’ गोपीनाथ क्षीर कैल चुरि ॥133॥
 
 
अनुवाद
मीठे चावल का बर्तन पकड़े हुए पुजारी ने पुकारा, "माधवेंद्र पुरी नाम के वह व्यक्ति कृपया आकर यह बर्तन ले जाएँ! गोपीनाथ ने आपके लिए मीठे चावल का यह बर्तन चुराया है!"
 
The priest picked up the pot of kheer and called out, "Whoever is named Madhavendra Puri, come and take this pot! Gopinath has stolen this pot of kheer for you!"
तात्पर्य
अंतिम सत्य और सापेक्षिक सत्य के अंतर की व्याख्या यहाँ की गई है। भगवान गोपीनाथ ने यहाँ खुले तौर पर घोषणा की है कि वह एक चोर हैं। उन्होंने मीठे चावल का बर्तन चुराया था, और यह बात गुप्त नहीं रखी गई क्योंकि उनकी चोरी का कार्य महान आध्यात्मिक आनंद का स्रोत है। भौतिक दुनिया में, चोरी अपराध है, लेकिन आध्यात्मिक दुनिया में भगवान की चोरी आध्यात्मिक आनंद का स्रोत है। सांसारिक बदमाश, जो भगवान के व्यक्तित्व की निरपेक्ष प्रकृति को नहीं समझ सकते, कभी-कभी भगवान श्री कृष्ण को अनैतिक कहते हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि उनकी प्रतीत होने वाली अनैतिक गतिविधियाँ, जो गुप्त नहीं रखी जाती हैं, भक्तों को आनंद देती हैं। भगवान के आध्यात्मिक व्यवहार को समझने में विफल, ये बदमाश उनके चरित्र को कलंकित करते हैं और तुरंत बदमाशों की श्रेणी (बदमाश, पुरुषों, राक्षसों और जिनका ज्ञान भ्रामक ऊर्जा द्वारा छीन लिया गया है) की श्रेणी में आते हैं। कृष्ण ने भगवद-गीता (7.15) में समझाया है:

न माम दुष्कृतीनो मूढाः प्रपद्यंते नराधमाः

मायापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः

"वे दुष्ट जो मूर्ख हैं, जो मनुष्य जाति में सबसे नीच हैं, जिनका ज्ञान भ्रम से चुराया गया है, और जो राक्षसों के नास्तिक स्वभाव में भाग लेते हैं, वे मेरे प्रति समर्पण नहीं करते हैं।" (Bg. 7.15)

सांसारिक बदमाश यह नहीं समझ सकते कि कृष्ण जो कुछ भी करते हैं, स्वभाव से निरपेक्ष होने के कारण, सब अच्छा है। भगवान के इस गुण को श्रीमद-भागवतम (10.33.29) में समझाया गया है। सांसारिक गणना से कोई व्यक्ति सर्वोच्च शक्तिशाली व्यक्ति के कुछ कार्यों को अनैतिक मान सकता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। उदाहरण के लिए, सूर्य पृथ्वी की सतह से पानी सोखता है, लेकिन यह केवल समुद्र से पानी नहीं सोखता है। यह मूत्र और अन्य अशुद्ध पदार्थों से युक्त गंदी नालियों और नालों से भी पानी सोखता है। इस तरह के पानी को सोखने से सूर्य प्रदूषित नहीं होता है। बल्कि सूर्य गंदी जगह को शुद्ध बना देता है। यदि कोई भक्त किसी अनैतिक या अनुचित उद्देश्य से भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के पास जाता है, तो भी वह शुद्ध हो जाता है; भगवान संक्रमित नहीं होते। श्रीमद-भागवतम (10.29.15) में कहा गया है कि यदि कोई सर्वोच्च प्रभु से वासना, क्रोध या भय (काम क्रोध भयम) में भी संपर्क करता है, तो वह शुद्ध हो जाता है। गोपियाँ युवा लड़कियाँ होने के कारण कृष्ण के पास इसलिए आईं क्योंकि वे एक सुंदर युवा लड़के थे। बाहरी दृष्टिकोण से, वे कामना से प्रभु के पास गईं, और प्रभु ने मध्यरात्रि में उनके साथ नृत्य किया। सांसारिक दृष्टिकोण से, ये क्रियाएँ अनैतिक प्रतीत हो सकती हैं क्योंकि एक विवाहित या अविवाहित युवती घर छोड़कर किसी युवक के साथ मिलकर उसके साथ नृत्य नहीं कर सकती। हालाँकि यह सांसारिक दृष्टिकोण से अनैतिक है, लेकिन गोपियों की गतिविधियों को पूजा के सर्वोच्च रूप के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि यह भगवान कृष्ण ही थे जिनके वे मृत रात्रि में वासनापूर्ण इच्छाओं के साथ संपर्क में थे।

किंतु ये बातें अनन्य भक्तों के लिए ही समझ में आ सकती हैं। कृष्ण को तो तत्व रूप से समझना होगा। साधरण बुद्धि से विचार करना चाहिए कि अगर केवल कृष्ण के पवित्र नाम के उच्चारण मात्र से ही शुद्धि होती है, तो फिर स्वयं श्रीकृष्ण कैसे अनैतिक हो सकते हैं? दुर्भाग्यवश, सांसारिक मूर्खों को शिक्षा जगत का नेता मान लिया गया है और उन्हें सामान्य जनता में अधर्म के सिद्धांतों को शिक्षित करने के लिए ऊंचे पद दिए गए हैं। इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवतम ( 7.5.31 ) में की गई है: अंधा यथांधैर उपनीयमानाह। नेत्रहीन नेत्रहीनों का नेतृत्व करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे दुष्टों की अपरिपक्व समझ के कारण, सामान्य लोगों को कृष्ण के गोपियों के साथ घटित हुए आनंद को लेकर चर्चा नहीं करनी चाहिए। एक अनन्य भक्त को उनके भक्तों के लिए मीठा चावल चुराने को लेकर हुई चर्चा भी नहीं करनी चाहिए। यह चेतावनी है कि हमें इन चीजों के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। यद्यपि कृष्ण तो पवित्रों में सबसे पवित्र हैं, सांसारिक लोग, कृष्ण के आनंदों के बारे में सोचकर, जो अनैतिक प्रतीत होते हैं, स्वयं दूषित हो जाते हैं। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने कभी सार्वजनिक रूप से गोपियों के साथ कृष्ण के संबंधों पर चर्चा नहीं की। वह इन संबंधों पर केवल तीनों करीबी दोस्तों के साथ ही चर्चा करते थे। उन्होंने कभी भी रासलीला की सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं की। जैसे पेशेवर पाठक करते हैं, यद्यपि उन्हें कृष्ण या दर्शकों की प्रकृति की समझ नहीं होती है। हालाँकि, श्री चैतन्य महाप्रभु ने जितना हो सके उतने घंटों तक विशाल पैमाने पर हरिनाम संकीर्तन को प्रोत्साहित किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)