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अनुवाद
माधवेंद्र पुरी मंदिर से निकलकर गाँव के खाली बाज़ार में बैठ गए। वहाँ बैठकर उन्होंने भजन-कीर्तन शुरू कर दिया। इसी बीच, मंदिर के पुजारी ने भगवान को विश्राम के लिए लिटा दिया।
Madhavendra Puri left the temple and sat down in the empty market place of the village. He sat there and began to chant. Meanwhile, the temple priest put the idol to rest.
तात्पर्य
यद्यपि माधवेंद्र पुरी को भोजन एवं निद्रा में कोई रुचि नहीं थी, महान-मंत्र के जप में उनकी रुचि एक परमहंस की तुलना में महाप्रभुता के चाहवान की तरह ही तीव्र थी। इसका अर्थ है कि परमहंस अवस्था में भी व्यक्ति जप को नहीं छोड़ सकता है। हरिदास ठाकुर और गोस्वामी सभी एक तय संख्या में जप करने में लगे हुए थे; इसलिए सबके लिए मोतियों पर जप करना बहुत महत्वपूर्ण है, फिर चाहे कोई परमहंस क्यों न बन जाए। यह जप कहीं भी किया जा सकता है, मंदिर के अंदर या बाहर। माधवेंद्र पुरी अपने जप को करने के लिए एक खाली बाजार में भी बैठ जाते थे। जैसा कि श्रीनिवास आचार्य ने गोस्वामियों से अपनी प्रार्थना में कहा है: नाम-गान-नतिभिः। एक परमहंस भक्त हमेशा प्रभु का जप करने और भक्ति सेवा में लीन रहता है। प्रभु के पवित्र नाम का जप करना और उनकी सेवा में लिप्त होना एक समान हैं। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (7.5.23) में कहा गया है, भक्ति सेवा के नौ प्रकार हैं: सुनना (श्रवणं), जप (कीर्तन), स्मरण (विष्णु स्मरण), सेवा (पाद-सेवन), देवता की पूजा (अर्चन), प्रार्थना (वंदन), आज्ञा का पालन (दास्य), उन्हें मित्र की तरह सेवा देना (सख्य) और प्रभु के लिए सब कुछ त्याग देना (आत्म-निवेदन)। यद्यपि प्रत्येक प्रक्रिया भिन्न दिखती है, जब कोई व्यक्ति परम तत्व पर स्थित होता है तो वह देख सकता है कि ये एक समान हैं। उदाहरण के लिए, सुनना उतना ही अच्छा है जितना जप करना, और याद करना उतना ही अच्छा है जितना जप या श्रवण। इसी तरह, देवता पूजन में लिप्त होना उतना ही अच्छा है जितना जप, श्रवण या स्मरण। भक्त से अपेक्षा की जाती है कि वह भक्ति सेवा की सभी नौ प्रक्रियाओं को स्वीकार करे, लेकिन यदि केवल एक प्रक्रिया भी ठीक से निष्पादित की जाती है, तब भी वह उच्चतम स्थिति (परमहंस) प्राप्त कर सकता है और घर वापस, भगवान के पास जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥