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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  2.4.123 
अयाचित - वृत्ति पुरी - विरक्त, उदास ।
अयाचित पाइले खा’न, नहे उपवास ॥123॥
 
 
अनुवाद
माधवेंद्र पुरी भीख माँगने से कतराते थे। वे भौतिक वस्तुओं के प्रति पूरी तरह से अनासक्त और उदासीन थे। अगर बिना माँगे कोई उन्हें कुछ खाने को दे देता, तो वे खा लेते थे; अन्यथा उपवास रखते थे।
 
Sri Madhavendra Puri avoided begging. He was completely detached and indifferent to material things. If someone offered him something to eat without asking, he would eat it; otherwise, he would fast.
तात्पर्य
हि परमहंस अवस्था है, सन्यासी के लिए सर्वोच्च अवस्था। सन्यासी घर-घर जाकर भिक्षा मांग सकता है सिर्फ भोजन एकत्र करने के लिए पर वह परमहंस जिसने अयाचित-वृत्ति या आज्ञगर-वृत्ति अपना ली है, वह किसी से भोजन नहीं मांगता। यदि कोई स्वेच्छा से उसे भोजन देता है, वह खाता है। अयाचित-वृत्ति का अर्थ है याचना न करने में आदी होना और आज्ञगर-वृत्ति एक अजगर की तरह होने को बताती है, जो बिना प्रयास भोजन प्राप्त करता है लेकिन भोजन स्वयं उसके मुंह में आ जाता है। दूसरे शब्दों में परमहंस विशेष रूप से भगवान की सेवा में समर्पित रहता है भोजन या नींद की भी परवाह नहीं करता। छह गोस्वामियों के बारे में कहा गया था: निद्राहार-विहारकादि-विजितौ। परमहंस में नींद, भोजन और इन्द्रियों के भोग की इच्छा पर विजय प्राप्त हो जाती है। दिन-रात भगवान की सेवा में लीन एक विनम्र, नम्र भिक्षुक बन जाता है। माधवेंद्र पुरी इस परमहंस अवस्था को प्राप्त कर चुके थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)