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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.4.111 
ताँर ठाञि मन्त्र लैल ऋतन करिञा ।
चलिला दक्षिणे पुरी ताँरे दीक्षा दिला ॥111॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य ने माधवेन्द्र पुरी से दीक्षा लेने की प्रार्थना की। उन्हें दीक्षा देने के बाद, माधवेन्द्र पुरी दक्षिण भारत के लिए प्रस्थान कर गए।
 
Advaita Acharya requested Madhavendra Puri to initiate him. After initiating him, Madhavendra Puri set out for South India.
तात्पर्य
इस संबंध में श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि अद्वैत आचार्य ने माधवेंद्र पुरी से दीक्षा ली थी, जो माधव-सम्प्रदाय के शिष्य परंपरा में एक संन्यासी थे। श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुसार:

किबा विप्र किबा न्यासी शूद्र केने नाय,

येई कृष्ण-तत्त्व-वत्ता, सेई 'गुरु' हय

"एक व्यक्ति ब्राह्मण, संन्यासी, शूद्र या जो भी हो सकता है, लेकिन अगर वह कृष्ण के विज्ञान में अच्छी तरह से पारंगत है, तो वह गुरु बन सकता है।" (चै च माधय 8.128) इस कथन का समर्थन श्री माधवेंद्र पुरी द्वारा किया गया है। पंचरात्र आदेश के अनुसार, केवल एक गृहस्थ ब्राह्मण ही दीक्षा दे सकता है। अन्य नहीं कर सकते। जब किसी व्यक्ति को दीक्षित किया जाता है, तो यह माना जाता है कि वह ब्राह्मण बन गया है; एक उचित ब्राह्मण द्वारा दीक्षित किए बिना, किसी को ब्राह्मण में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, जब तक कोई ब्राह्मण न हो, वह दूसरे को ब्राह्मण नहीं बना सकता। एक गृहस्थ-ब्राह्मण वर्णाश्रम-धर्म संस्था में भाग लेकर अपने ईमानदार श्रम के माध्यम से भगवान विष्णु की पूजा करने के लिए विभिन्न प्रकार के उपउपकरण हासिल कर सकता है। वास्तव में, लोग केवल वर्णाश्रम संस्था में सफल होने या भौतिक इच्छाओं से मुक्त होने के लिए इन गृहस्थ ब्राह्मणों द्वारा दीक्षित होने की भीख मांगते हैं। इसलिए गृहस्थ-आश्रम में एक आध्यात्मिक गुरु का सख्त वैष्णव होना आवश्यक है। संन्यास आदेश से एक आध्यात्मिक गुरु के पास पूजा करने का बहुत कम अवसर होता है, देवता की पूजा करता है, लेकिन जब कोई पारलौकिक संन्यासियों से आध्यात्मिक गुरु स्वीकार करता है, तो देवता पूजा का सिद्धांत बिल्कुल भी उपेक्षित नहीं होता है। इस निष्कर्ष को लागू करने के लिए, श्री चैतन्य महाप्रभु ने हमें किबा विप्र किबा न्यासी, आदि कविता में अपनी राय दी। यह इंगित करता है कि प्रभु समाज की इस दुर्बलता को समझते थे कि केवल एक गृहस्थ-ब्राह्मण को आध्यात्मिक गुरु होना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने संकेत दिया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आध्यात्मिक गुरु एक गृहस्थ (गृहस्थ), एक संन्यासी या यहाँ तक कि एक शूद्र है। एक आध्यात्मिक गुरु को बस शास्त्र के सार में पारंगत होना चाहिए; उसे ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझना चाहिए। तभी कोई आध्यात्मिक गुरु बन सकता है। दीक्षा का वास्तव में अर्थ है एक शिष्य को पारलौकिक ज्ञान के साथ दीक्षा देना जिससे वह सभी भौतिक संदूषणों से मुक्त हो जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)