गोपाल कहे, पुरी आमार ताप नाहि याय ।
मलयज - चन्दन ले प’, तबे से जुड़ाय ॥106॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
माधवेंद्र पुरी ने स्वप्न में गोपाल को देखा, जिन्होंने कहा, "मेरे शरीर का तापमान अभी भी कम नहीं हुआ है। कृपया मलय प्रदेश से चंदन लाएँ और उसका लेप मेरे शरीर पर लगाकर मुझे शीतल करें।"
In his dream, Madhavendra Puri saw Gopal saying, "My body temperature hasn't subsided yet. Bring sandalwood from the Malaya region and apply it to my body to cool me down."
तात्पर्य
गोपाल देवता जंगल में कई सालों से दबे थे और भले ही उन्होंने कई पानी के बर्तन रखे थे, फिर भी उसे भयंकर गर्मी महसूस हो रही थी। इसलिए उन्होंने माधवेंद्रपुरी से मलय प्रांत से चंदन लाने को कहा। मलय में पाया जाने वाला चंदन काफ़ी लोकप्रिय है। यह प्रांत पश्चिमी घाट में स्थित है और नीलगिरि की पहाड़ी कभी-कभी मलय पहाड़ी के रूप में जानी जाती है। मलय प्रांत में पाए जाने वाले चंदन को दर्शाने के लिए ‘मलय-जा’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी मलय शब्द मलेशिया के आधुनिक देश को दर्शाता है। पहले इस देश में भी चंदन का उत्पादन हुआ करता था पर अब उसे रबड़ के वृक्षों का उत्पादन उगाना ज़्यादा फ़ायदेमंद लगता है। भले ही मलेशिया में पहले वैदिक संस्कृति का प्रचलन था, लेकिन अब वहां के सभी लोग मुस्लिम हैं। मलेशिया, जावा और इंडोनेशिया में वैदिक संस्कृति अब खत्म हो चुकी है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥