Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  2.4.102 
एक एक व्रज - वासी एक एक गाभी दिल ।
सहस्र सहस्र गाभी गोपालेर हैल ॥102॥
 
 
अनुवाद
व्रजभूमि में रहने वाले प्रत्येक परिवार ने एक गाय दान में दी। इस प्रकार, हजारों गायें गोपाल की संपत्ति बन गईं।
 
Every family in Vrajbhumi donated a cow. Thus, thousands of cows became Gopal's property.
तात्पर्य
यह विधि मूर्ति स्थापना, मंदिर निर्माण और मंदिर की संपत्ति वृद्धि के लिए है। मंदिर निर्माण में हर किसी को यथासंभव सहयोग देना चाहिए और प्रसाद वितरण के लिए भोजन भी देना चाहिए। भक्तों को भक्ति सेवार्थ ज्ञान का प्रचार करना चाहिए और इस तरह लोगों को मूर्ति की व्यावहारिक सेवा में लगाना चाहिए। धनी लोग भी इस कार्य में सहयोग के लिए प्रेरित हो सकते हैं। इस तरह से हर कोई आध्यात्मिक रूप से झुकाव रखेगा और सारा समाज कृष्णचेतना में परिवर्तित हो जाएगा। भौतिक इंद्रियों को संतुष्ट करने की इच्छा अपने आप ही कम हो जाएगी और इंद्रियां इतनी पवित्र हो जाएँगी कि वे भक्ति (भगवान की भक्ति पूर्ण सेवा) में सक्षम हो जाएँगी। हृषीकेण हृषीकेश सेवनं भक्तिरुच्यते। भगवान की सेवा करते हुए, हमारी इंद्रिय धीरे-धीरे पवित्र हो जाती है। हमारी पवित्र इंद्रियों को भगवान हृषीकेश की सेवा में लगाना ही भक्ति कहलाती है। जब भक्ति की निद्रित प्रवृत्ति जागृत होती है, हम भगवान को उसी रूप में समझ पाते हैं। भक्त्या मामभिजानाति यावान् यस्चासमि तत्त्वतः। (भगवद्गीता 18.55) यह मानवता को कृष्णचेतना जगाने का अवसर देने की प्रक्रिया है। इस प्रकार लोग अपने जीवन को हर प्रकार से श्रेष्ठ बना सकते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)