यस्मै दातुं चोरयन्क्षीर - भाण्डं गोपीनाथः क्षीर - चोराभिधोऽभूत् ।
श्री - गोपालः प्रादुरासीद्वशः सन् यत्प्रेम्णा तं माधवेन्द्रं नतोऽस्मि ॥1॥
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अनुवाद
मैं माधवेन्द्र पुरी को सादर प्रणाम करता हूँ, जिन्हें श्रीगोपीनाथ ने चुराकर मीठे चावलों का एक पात्र दिया था, जिसे बाद में क्षीर-कोरा के रूप में मनाया गया। माधवेन्द्र पुरी के प्रेम से प्रसन्न होकर, गोवर्धनदेव श्रीगोपाल ने जनता के सामने दर्शन दिए।
I offer my respectful obeisances to Madhavendra Puri, to whom Sri Gopinath stole a pot of kheer and subsequently earned the name Ksheer-Chora. Pleased with Madhavendra Puri's love, the idol of Sri Gopala in Govardhan appeared before the crowd.
तात्पर्य
भक्तिविनोद ठाकुर ने व्याख्या की है कि यह गोपाल देवता मूल रूप से कृष्ण के परपौत्र वज्र द्वारा स्थापित किया गया था। माधवेंद्र पुरी ने गोपाल को फिर से खोजा और गोवर्धन पहाड़ी के ऊपर स्थापित किया। यह गोपाल देवता अब नाथद्वारा में स्थित है और वल्लभाचार्य के वंशजों के प्रबंधन में है। देवता की पूजा बहुत विलासितापूर्ण है, और वहां जाने वाला व्यक्ति कम कीमत चुकाकर प्रसाद की किस्में खरीद सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥