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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  2.3.99 
नित्यानन्द बले , - एइ कृष्णेर प्रसाद ।
इहाके ‘झुठा’ कहिले, तुमि कैले अपराध ॥99॥
 
 
अनुवाद
नित्यानंद प्रभु ने उत्तर दिया, "ये भगवान कृष्ण द्वारा छोड़े गए भोजन के अवशेष हैं। यदि आप इन्हें साधारण अवशेष समझते हैं, तो आपने अपराध किया है।"
 
Nityananda Prabhu replied, "This is Lord Krishna's leftovers. If you consider it ordinary leftovers, you have committed a crime."
तात्पर्य
बृहद-विष्णु पुराण में बताया गया है कि जो महा-प्रसाद को साधारण चावल और दाल के बराबर समझता है, वह निश्चित रूप से महा-अपराध करता है। साधारण खाद्य पदार्थ छूने योग्य और अछूत होते हैं लेकिन जहां प्रसाद की बात आती है, वहां इस तरह के द्वैतवादी विचार नहीं होते हैं। प्रसाद पारलौकिक है और उसमें कोई रूपांतरण या दोष नहीं होता, जैसे कि स्वयं भगवान विष्णु के शरीर में कोई दोष या रूपांतरण नहीं होता है। इसलिए भले ही कोई ब्राह्मण हो, अगर वह इस तरह के द्वैतवादी विचार करता है, तो उस पर निश्चित रूप से कोढ़ का हमला हो जाएगा और वह अपने सभी परिवार के सदस्यों से अलग हो गया जाएगा। ऐसा अपराधी नरक जाता है और कभी वापस नहीं आता है। यह बृहद-विष्णु पुराण का नियम है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)