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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  2.3.98 
आपनार सम मोरे करिबार तरे ।
झुठा दिले, विप्र ब लि’ भय ना करिले ॥98॥
 
 
अनुवाद
"मुझे भी अपने जैसा पागल बनाने के लिए तुमने अपने बचे हुए खाने को मुझ पर फेंक दिया। तुम्हें इस बात का भी डर नहीं था कि मैं एक ब्राह्मण हूँ।"
 
"You threw leftovers at me just to make me as mad as you. You didn't even care that I was a Brahmin."
तात्पर्य
शब्द आपनारा सम बताते हैं कि अद्वैत आचार्य स्वयं को स्मार्त-ब्राह्मणों से संबंधित मानते थे, और वे नित्यानंद प्रभु को शुद्ध वैष्णवों के साथ पारलौकिक अवस्था में मानते थे। भगवान नित्यानंद ने अद्वैत आचार्य को अपने अवशेष दिए, उन्हें उसी स्तर पर लाने और उन्हें एक शुद्ध और अविरल वैष्णव या परमहंस बनाने के लिए। अद्वैत आचार्य के कथन से पता चलता है कि एक परमहंस वैष्णव पारलौकिक रूप से स्थित है। एक शुद्ध वैष्णव स्मार्त-ब्राह्मणों के नियमों और कायदों के अधीन नहीं होता है। यही कारण था कि अद्वैत आचार्य ने कहा, आपनारा सम औरे करिबारा तारे: "मुझे अपने ही स्तर तक ऊपर उठाना।" एक शुद्ध वैष्णव, या एक व्यक्ति जो परमहंस अवस्था में होता है, भोजन के अवशेष (महा-प्रसादम) को आध्यात्मिक स्वरूप में स्वीकार करता है। वह इसे भौतिक या इंद्रिय तृप्तिकारक नहीं मानता है। वह महा-प्रसादम को साधारण दाल और चावल के रूप में नहीं बल्कि आध्यात्मिक पदार्थ के रूप में स्वीकार करता है। एक शुद्ध वैष्णव के द्वारा छोड़े गए भोजन के अवशेषों के बारे में कहने के लिए कुछ भी नहीं है, प्रसाद कभी भी दूषित नहीं होता है, भले ही उसे किसी चांडाल के मुंह से छुआ गया हो। निश्चित रूप से, यह अपने आध्यात्मिक मूल्य को बनाए रखता है। इसलिए, इस तरह के महा-प्रसादम को खाने या छूने से, एक ब्राह्मण नीचा नहीं होता है। इस तरह के भोजन के अवशेषों को छूने से प्रदूषित होने का कोई सवाल ही नहीं है। वास्तव में, इस तरह के महा-प्रसादम को खाने से व्यक्ति भौतिक स्थिति के सभी दोषों से मुक्त हो जाता है। यही शास्त्र का निर्णय है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)