श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  2.3.84 
शुनि’ नित्यानन्देर कथा ठाकुर अद्वैत ।
कहेन ताँहारे किछु पाइया पिरीत ॥84॥
 
 
अनुवाद
नित्यानंद प्रभु के कथन को सुनकर परम कृपालु अद्वैत आचार्य ने विनोदपूर्ण शब्दों द्वारा प्रस्तुत अवसर का लाभ उठाया और उनसे इस प्रकार कहा।
 
After listening to the humorous talks of Nityananda, Thakur Advaita Acharya got an opportunity to joke, hence he said as follows.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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