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श्लोक 2.3.84  |
शुनि’ नित्यानन्देर कथा ठाकुर अद्वैत ।
कहेन ताँहारे किछु पाइया पिरीत ॥84॥ |
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| अनुवाद |
| नित्यानंद प्रभु के कथन को सुनकर परम कृपालु अद्वैत आचार्य ने विनोदपूर्ण शब्दों द्वारा प्रस्तुत अवसर का लाभ उठाया और उनसे इस प्रकार कहा। |
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| After listening to the humorous talks of Nityananda, Thakur Advaita Acharya got an opportunity to joke, hence he said as follows. |
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