श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.3.8 
परात्म - निष्ठा - मात्र वेष - धारण ।
मुकुन्द - सेवाय हय संसार - तारण ॥8॥
 
 
अनुवाद
संन्यास ग्रहण करने का वास्तविक उद्देश्य मुकुंद की सेवा में स्वयं को समर्पित करना है। मुकुंद की सेवा करके, व्यक्ति वास्तव में भव-बंधन से मुक्त हो सकता है।
 
The true purpose of accepting renunciation is to dedicate oneself to the service of Mukunda. By serving Mukunda, one can certainly be freed from the bondage of material existence.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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