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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  2.3.74 
प्रभु बले - एत अन्न नारिब खाइते ।
सन्न्यासीर धर्म नहे उच्छिष्ट राखिते ॥74॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "मैं इतना भोजन नहीं खा पाऊँगा, और बचा हुआ भोजन छोड़ना संन्यासी का कर्तव्य नहीं है।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, “I will not be able to eat so much food and it is not the duty of a Sanyasi to leave leftovers.”
तात्पर्य
श्रीमद् भागवतम (11.18.19) के अनुसार:

बहिर्जलाशयं गत्वा ततोऽस्पृश्यवाक्-यतः

विभज्य पावितं शेषं भुञ्जीताशेषम आहृतम्

"जो भी भोजन कोई संन्यासी किसी गृहस्थ के घर से प्राप्त करे उसे चाहिए कि वह उसे किसी नदी या झील के पास ले जाए, और विष्णु, ब्रह्मा और सूर्य को भोजन अर्पित करने के बाद (तीन भागों में), उसे स्वयं खाना चाहिए और दूसरों के लिए कुछ नहीं बचाना चाहिए।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)