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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  2.3.70 
प्रभु कहे - सन्न्यासीर भक्ष्य नहे उपकरण ।
इहा खाइले कैछे हय इन्द्रिय वारण ॥70॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "एक संन्यासी के लिए इतनी विविधतापूर्ण खाद्य सामग्री खाना उचित नहीं है। अगर वह ऐसा करता है, तो वह अपनी इंद्रियों को कैसे नियंत्रित कर पाएगा?"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "It is not appropriate for a sannyasi to partake of so many kinds of food. If he does so, how can he control his senses?"
तात्पर्य
उपकरण शब्द से कई प्रकार के खाद्य पदार्थों का बोध होता है जैसे कि दाल, सब्ज़ियाँ तथा अन्य प्रकार की सम्भव चीजें जिन्हें चावल के साथ बहुत अच्छे से खाया जा सकता है। परन्तु, एक सन्यासी के लिए ऐसे स्वादिष्ट पदार्थों का सेवन करना उचित नहीं होता। यदि वह ऐसा करता है, तो वह अपनी इंद्रियों पर काबू नहीं रख पाता। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कभी सन्यासियों को स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ खाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया क्योंकि सम्पूर्ण वैष्णव पंथ वैराग्य-विद्या है और जितना सम्भव हो उतना त्यागमय। चैतन्य महाप्रभु ने राघुनाथ दास गोस्वामी को भी यही सलाह दी थी कि वे स्वादिष्ट भोजन न करें, अच्छे वस्त्र न पहनें और सांसारिक विषयों पर चर्चा न करें। त्यागी संप्रदाय के लोगों के लिए ये सभी चीजें वर्जित हैं। एक भक्त भगवान कृष्ण को अर्पित भोजन के अतिरिक्त और कुछ नहीं स्वीकार करता। कृष्ण को अर्पित सभी भव्य भोजन गृहस्थों को दे दिया जाता है। कृष्ण को बहुत सारी अच्छी चीजें अर्पित की जाती हैं जैसे कि माला, चारपाई, अच्छे आभूषण, अच्छा भोजन और यहाँ तक कि पान, सुपारी भी भली-भाँति तैयार करके; परन्तु एक विनम्र वैष्णव अपने शरीर को भौतिक और गंदा समझता है, अतः वह ऐसी चीजों को स्वयं के लिए स्वीकार नहीं करता। वह सोचता है कि ऐसी चीजों के सेवन से वह प्रभु के चरण-कमलों का अपमान करेगा। सहजियावृत्ति के अनुयायी यह समझ नहीं पाते कि श्री चैतन्य महाप्रभु का क्या मतलब था जब उन्होंने अद्वैत आचार्य से दो अलग-अलग पत्ते लाने के लिए कहा था और उन्हें उन्होंने थोड़ा सा प्रसाद दिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)