प्रभु जाने तिन भोग - कृष्णेर नैवेद्य ।
आचार्सेर मनः - कथा नहे प्रभुर वेद्य ॥66॥
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अनुवाद
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कक्ष में प्रवेश किया, तो उन्होंने भोजन के तीन भाग देखे, और वे समझ गए कि ये सभी कृष्ण के लिए हैं। हालाँकि, वे अद्वैत आचार्य के आशय को नहीं समझ पाए।
When Sri Chaitanya Mahaprabhu entered the room, he saw three portions of food and understood that they were for Krishna. But he could not understand Advaita Acharya's feelings.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि इनमें से एक भोग धातु की थाली में परोसा गया था और यह कृष्ण के लिए था, जबकि अन्य दो बड़े केले के पत्तों पर रखे गए थे। धातु की थाली पर भोग स्वयं अद्वैत आचार्य द्वारा कृष्ण को अर्पित किया गया था। केले के पत्तों पर रखे गये अन्य दो भोग श्री चैतन्य महाप्रभु और प्रभु नित्यानंद द्वारा स्वीकार किए जाने थे। अद्वैत आचार्य का यही इरादा था, लेकिन उन्होंने इस बात का श्री चैतन्य महाप्रभु को पता नहीं चलने दिया। इस तरह जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने तीन स्थानों पर भोजन अर्पित देखा, तो उन्होंने सोचा कि यह सब कृष्ण के लिए है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥