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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  2.3.63 
हरिदास कहे - मुञि पापिष्ठ अधम ।
बाहिरे एक मुष्टि पाछे करिमु भोजन ॥63॥
 
 
अनुवाद
हरिदास ठाकुर ने कहा, "मैं मनुष्यों में सबसे अधिक पापी और नीच हूँ। बाद में मैं बाहर प्रतीक्षा करते हुए एक मुट्ठी प्रसाद खाऊँगा।"
 
Haridasa Thakura said, "I am extremely sinful and lowly. I will wait outside and eat a handful of prasada later."
तात्पर्य
हालाँकि हिन्दू और मुसलमान बहुत ही मैत्रीपूर्ण तरीके से साथ रहते थे, फिर भी उनके बीच भेद थे। मुसलमानों को यावनों या नीच माना जाता था और जब भी किसी मुसलमान को आमंत्रित किया जाता, उसे घर के बाहर खाना खिलाया जाता। हालाँकि श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु ने उन्हें अपने साथ प्रसाद लेने के लिए व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित किया था, फिर भी बहुत विनम्रता से हरिदास ठाकुर ने कहा, "मैं घर के बाहर प्रसाद ग्रहण करूंगा।" हालाँकि हरिदास ठाकुर एक श्रेष्ठ वैष्णव थे जिन्हें अद्वैत आचार्य, नित्यानंद प्रभु और श्री चैतन्य महाप्रभु स्वीकार करते थे, फिर भी सामाजिक शांति भंग न हो, इसके लिए उन्होंने विनम्रतापूर्वक खुद को एक मुसलमान के रूप में रखा, जो हिंदू समुदाय के अधिकार क्षेत्र से बाहर था। इसलिए उन्होंने घर के बाहर प्रसाद लेने का प्रस्ताव रखा। हालाँकि वह एक उच्च पद पर थे और अन्य महान वैष्णवों के समान थे, फिर भी वह खुद को पापिष्ठ, सबसे पापी व्यक्ति और अधम, लोगों में सबसे नीच समझते थे। हालाँकि एक वैष्णव आध्यात्मिक रूप से बहुत उन्नत हो सकता है, वह बाहरी रूप से विनम्र और विनम्र बना रहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)