Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
सभी खाद्य पदार्थ पहले अद्वैत आचार्य की पत्नी द्वारा पकाए गए। फिर श्रील अद्वैत आचार्य ने स्वयं भगवान विष्णु को सब कुछ अर्पित किया।
First of all Advaita Acharya's wife prepared all the dishes. Thereafter, Srila Advaita Acharya himself offered everything to Lord Vishnu.
तात्पर्य
यह आदर्श गृहस्थ जीवन है। पति-पत्नी साथ रहते हैं और पति भगवान विष्णु की पूजा के लिए उपचारों की व्यवस्था करने के लिए बहुत कठोर परिश्रम करता है। घर पर पत्नी भगवान विष्णु के लिए विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाती है और पति उसे देवता को अर्पित करता है। उसके बाद, आरती की जाती है और प्रसाद को परिवार के सदस्यों और मेहमानों में वितरित किया जाता है। वैदिक सिद्धांतों के अनुसार, एक गृहस्थ के घर में हमेशा एक अतिथि होना चाहिए। मेरे बचपन में मैंने वास्तव में अपने पिता को हर दिन कम से कम चार अतिथियों का स्वागत करते हुए देखा है और उन दिनों मेरे पिता की आय बहुत अधिक नहीं थी। फिर भी, हर दिन कम से कम चार अतिथियों को प्रसाद अर्पित करने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। वैदिक सिद्धांतों के अनुसार, एक गृहस्थ को दोपहर का भोजन करने से पहले, बाहर जाना चाहिए और बहुत जोर से आवाज देकर यह देखना चाहिए कि क्या कोई भोजन के बिना है। इस तरह वह लोगों को प्रसाद लेने के लिए आमंत्रित करता है। यदि कोई आता है, तो गृहस्थ उसे प्रसाद अर्पित करता है, और यदि बहुत अधिक शेष नहीं है, तो उसे अतिथि को अपना भाग अर्पित करना चाहिए। यदि उसकी पुकार का कोई जवाब नहीं देता है, तो गृहस्थ अपना दोपहर का भोजन ग्रहण कर सकता है। इस प्रकार गृहस्थ जीवन भी एक प्रकार की तपस्या है। इसी वजह से गृहस्थ जीवन को गृहस्थ-आश्रम कहा जाता है। यद्यपि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों के साथ कृष्ण चेतना में सुखी रह सकता है, वह किसी भी मंदिर में पालन किए जाने वाले नियंत्रण सिद्धांतों का भी पालन करता है। यदि कृष्ण चेतना नहीं है, तो गृहस्थ के निवास को गृह-मेधी का घर कहा जाता है। कृष्ण चेतना में रहने वाले गृहस्थ वास्तव में गृहस्थ होते हैं - अर्थात, अपने परिवार और बच्चों के साथ आश्रम में रहने वाले लोग। श्री अद्वैत प्रभु एक आदर्श गृहस्थ थे और उनका घर आदर्श गृहस्थ-आश्रम था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥