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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  2.3.217 
‘चैतन्य - मङ्गले’ प्रभुर नीलाद्रि - गमन ।
विस्तारि वर्णियाछेन दास - वृन्दावन ॥217॥
 
 
अनुवाद
चैतन्य-मंगल [चैतन्य-भागवत] नामक अपने ग्रंथ में, वृन्दावन दास ठाकुर ने भगवान के जगन्नाथ पुरी गमन का विस्तृत वर्णन किया है।
 
Vrindavan Das Thakur has described in detail the journey of Mahaprabhu to Jagannath Puri in his book Chaitanya Mangal (Chaitanya Bhagavata).
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने बंगाल से गुज़रते हुए आतिसार-ग्राम, वराह-ग्राम और चत्रभोग से गुज़रे। फिर वह उड़ीसा प्रांत पहुँचे, जहाँ से वह प्रयाग-घाट से गुज़रे; सुवर्णरेखा नदी; रेमुना; याजपुर, जहां उन्होंने वैतरणी नदी पर दशाश्वमेध-घाट पर स्नान किया; कटक (कटक), जहाँ महानदी नदी बहती है; भुवनेश्वर, जहाँ बिंदु-सरोवर नामक एक बड़ी झील है; कमलापुर; और आठरनाला। इस प्रकार, इन सभी और अन्य स्थानों से गुज़रते हुए, वह जगन्नाथ पुरी पहुँचे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)