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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 216
 
 
श्लोक  2.3.216 
गङ्गा - तीरे - तीरे प्रभु चारि - जन - साथे ।
नीलाद्रि चलिला प्रभु छत्रभोग - पथे ॥216॥
 
 
अनुवाद
भगवान, अन्य चार व्यक्तियों के साथ, चत्रभोग के मार्ग से गंगा के तट पर नीलाद्रि, जगन्नाथ पुरी की ओर चले गए।
 
Mahaprabhu along with the four persons started walking along the banks of river Ganga via Chhatrabhoga towards Niladri i.e. Jagannath Puri.
तात्पर्य
पूर्व रेलवे के दक्षिणी खंड में, चौबीस परगना ज़िले में, मगराहाटा नाम का एक स्टेशन है। यदि उस स्टेशन के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में लगभग चौदह मील की दूरी पर कोई जाए, तो वहाँ जयनगर नामक स्थान है। इस जयनगर स्टेशन से दक्षिण में लगभग छह मील की दूरी पर चत्रभोग नामक एक गाँव है। कभी-कभी इस गाँव को खाड़ी कहा जाता है। इस गाँव में भगवान शिव की एक मूर्ति है जिसे वैजुर्कनाथ के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक वर्ष चैत्र (मार्च-अप्रैल) के महीने में वहाँ एक त्योहार मनाया जाता है। इस त्योहार को नंदा-मेला के नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में वहाँ गंगा नहीं बहती है। इसी रेलवे लाइन पर एक और स्टेशन है, जिसे बरुईपुर के नाम से जाना जाता है, और इस स्टेशन के पास आतिसार नामक एक और स्थान है। पहले यह गाँव भी गंगा के तट पर स्थित था। कोई व्यक्ति इस गाँव से पानीहाटी जा सकता है और वहाँ से कलकत्ता के उत्तर में स्थित वराह-नगर जा सकता है। उन दिनों गंगा कलकत्ता के दक्षिण में काली-घाट के माध्यम से बहती थी, जिसे अब भी आदि-गंगा के नाम से जाना जाता है। बरुईपुर से, गंगा शाखा बनाकर मथुरापुर पुलिस स्टेशन के पास डायमंड हार्बर से होकर बहती थी। यह ध्यान देने योग्य है कि श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी जाने के रास्ते में इन सभी स्थानों से होकर गुजरे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)