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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 212
 
 
श्लोक  2.3.212 
निरपेक्ष ह ञा प्रभु शीघ्र चलिला ।
कान्दिते कान्दिते आचार्य पश्चात्चलिला ॥212॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वे तुरंत वहाँ से चले गए और अद्वैत आचार्य रोते हुए उनके पीछे-पीछे चले।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu was unaffected. He walked quickly, with Advaita Acharya following him, weeping.
तात्पर्य
जैसा कि श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर व्याख्या करते हैं, निरपेक्ष शब्द का अर्थ है किसी भी भौतिक चीज़ से प्रभावित ना होना और भगवान की सेवा में स्थिर रहना। श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथ पुरी के लिए प्रस्थान करते समय अद्वैत आचार्य के घर पर मचाए गए हंगामे और रोने की परवाह नहीं की थी। सांसारिक नैतिकतावादी लोग श्री चैतन्य महाप्रभु की बहुत क्रूर होने के लिए आलोचना कर सकते हैं, परंतु भगवान ने ऐसी आलोचनाओं की परवाह नहीं की। कृष्ण चेतना आंदोलन के विश्व-गुरु के रूप में, उन्होंने वास्तव में दिखाया कि कृष्ण चेतना में गंभीर रूप से लगे हुए व्यक्ति को सांसारिक स्नेह से प्रभावित नहीं होना चाहिए। भगवान की सेवा करने और भौतिक उद्देश्यों के प्रति उदासीन हो जाने में ही श्रेष्ठता है। बाहरी रूप से हर कोई भौतिक चीज़ों से जुड़ा हुआ है, परंतु यदि कोई ऐसी चीज़ों में उलझ जाता है, तो वह कृष्ण चेतना में प्रगति नहीं कर सकता है। इसलिए कृष्ण चेतना में लगे हुए लोगों को भौतिक दुनिया की तथाकथित नैतिकता की परवाह नहीं करनी चाहिए अगर वह नैतिकता भगवान की सेवा का विरोध करती है। जैसा कि भगवान चैतन्य महाप्रभु ने व्यक्तिगत रूप से दिखाया है, कोई भी निष्पक्ष हुए बिना कृष्ण चेतना को ठीक से निष्पादित नहीं कर सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)