श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 183
 
 
श्लोक  2.3.183 
नीलाचले नवद्वीपे येन दुइ घर ।
लोक - गतागति - वार्ता पाब निरन्तर ॥183॥
 
 
अनुवाद
"चूँकि जगन्नाथ पुरी और नवद्वीप का आपस में गहरा संबंध है — मानो वे एक ही घर के दो कमरे हों — नवद्वीप के लोग सामान्यतः जगन्नाथ पुरी जाते हैं, और जगन्नाथ पुरी के लोग नवद्वीप जाते हैं। इस आने-जाने से भगवान चैतन्य के समाचार पहुँचने में मदद मिलेगी। इस तरह मैं उनके समाचार प्राप्त कर सकूँगा।"
 
"Since Jagannatha Puri and Navadwip are closely related—like two rooms in the same house—people from Navadwip generally visit Jagannatha Puri, and those from Jagannatha Puri visit Navadwip. This coming and going will facilitate news of Chaitanya Mahaprabhu. This way, I will continue to receive news of him."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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