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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 181
 
 
श्लोक  2.3.181 
तेंहो यदि इहाँ रहे, तबे मोर सुख ।
ताँ’र निन्दा हय यदि, सेह मोर दुःख ॥181॥
 
 
अनुवाद
शचीमाता ने कहा, "यदि निमाई (श्री चैतन्य महाप्रभु) यहाँ रहें तो यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात होगी। लेकिन साथ ही, यदि कोई उन्हें दोष देगा, तो यह मेरे लिए बहुत दुःख की बात होगी।"
 
Shachimata said, "It would be a matter of great happiness for me if Nimai (Sri Chaitanya Mahaprabhu) lived here. But if anyone were to criticize him, it would be a matter of great sorrow for me."
तात्पर्य
एक माँ के लिए यह बहुत बड़ी खुशी की बात है अगर उसका बेटा कृष्ण की खोज करने के लिए घर न छोड़े और उसके साथ रहे। लेकिन अगर एक बेटा कृष्ण की खोज नहीं करता है और बस घर पर ही रहता है, तो अनुभवी महान संत उसे ज़रूर दोष देते हैं। इस तरह के दोष निश्चित रूप से माँ के लिए बहुत उदासी लेकर आते हैं। अगर एक सच्ची माँ चाहती है कि उसका बेटा आध्यात्मिक रूप से तरक्की करे, तो उसे अपने बेटे को कृष्ण की खोज के लिए जाने देना चाहिए। माँ स्वाभाविक रूप से अपने बेटे की खुशहाली चाहती है। अगर माँ अपने बेटे को कृष्ण की तलाश के लिए नहीं जाने देती है, तो उसे माँ कहलाने के लायक नहीं। उसे माया कहना चाहिए। अपने बेटे को संन्यासी बनकर कृष्ण की तलाश करने देने से शचीमाता दुनिया की सभी माताओं को कुछ सीख देती हैं। वह बताती हैं कि सभी बेटों को कृष्ण का असली भक्त बनना चाहिए और स्नेही माँ की देखरेख में घर पर नहीं रहना चाहिए। इस बात का समर्थन श्रीमद्- भागवतम (5.5.18) में भी किया गया है:

गुरु न सा स्यात स्व-जन न सा स्यात्

 पिता न सा स्याज् जननी न सा स्यात्

दैवं न तत् स्यान् न पतिश च सा स्यान्

 न मोचयेद यः समुपेता-मृत्युम

"कोई भी आध्यात्मिक गुरु न हो - न कोई रिश्तेदार, पिता, माँ, पूजनीय देवता या पति - अगर वह किसी व्यक्ति की आसन्न मृत्यु के रास्ते से बचने में मदद नहीं कर सकता है।" हर जीव ब्रह्मांड में भटक रहा है, कर्म के नियम के अधीन और एक शरीर से दूसरे शरीर में और एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर विचरण कर रहा है। इसलिए पूरा वैदिक तरीका यही है कि भटकते हुए जीवों को माया - जन्म, मृत्यु, बीमारी और बुढ़ापे- के चंगुल से बचाया जाए। इसका मतलब है जन्म और मृत्यु के चक्र को रोकना। यह चक्र तभी रोका जा सकता है जब कोई कृष्ण की पूजा करता है। जैसा कि भगवान ने भगवद-गीता (4.9) में कहा है:

जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति तत्वतः

त्याक्त्वा देहं पुनर् जन्म नाइति माम एति सोऽर्जुन

"हे अर्जुन, जो मेरे प्रकट होने और मेरे कार्यों की दिव्य प्रकृति को जानता है, वह शरीर छोड़ने पर इस भौतिक दुनिया में दोबारा जन्म नहीं लेता है, बल्कि मेरे शाश्वत निवास को प्राप्त करता है।"

जन्म और मृत्यु के चक्र को रोकने के लिए, किसी को भी कृष्ण को वैसा ही समझना होगा जैसा वह हैं। सिर्फ कृष्ण को जानकर ही कोई इस भौतिक दुनिया में पुनर्जन्म की प्रक्रिया को रोक सकता है। कृष्ण भावना में कार्य करने से कोई भगवान के पास लौट सकता है। जीवन की सबसे बड़ी पूर्णता एक पिता, माँ, गुरु, पति या परिवार के किसी भी अन्य सदस्य के लिए यही होती है कि वह दूसरों की भगवान के पास, वापस घर लौटने में मदद करे। यह रिश्तेदारों के लाभ के लिए सबसे ज़्यादा पसंदीदा कल्याणकारी गतिविधि है। इसलिए शचीमाता, हालांकि निमाई पंडित की माँ थीं, श्री चैतन्य महाप्रभु ने सभी तथ्यों पर विचार किया और अपने बेटे को कृष्ण की खोज के लिए जाने देने का फैसला किया। साथ ही, उन्होंने कुछ इंतज़ाम किये ताकि उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु की सभी गतिविधियों की खबर मिलती रहे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)