गुरु न सा स्यात स्व-जन न सा स्यात्
पिता न सा स्याज् जननी न सा स्यात्
दैवं न तत् स्यान् न पतिश च सा स्यान्
न मोचयेद यः समुपेता-मृत्युम
"कोई भी आध्यात्मिक गुरु न हो - न कोई रिश्तेदार, पिता, माँ, पूजनीय देवता या पति - अगर वह किसी व्यक्ति की आसन्न मृत्यु के रास्ते से बचने में मदद नहीं कर सकता है।" हर जीव ब्रह्मांड में भटक रहा है, कर्म के नियम के अधीन और एक शरीर से दूसरे शरीर में और एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर विचरण कर रहा है। इसलिए पूरा वैदिक तरीका यही है कि भटकते हुए जीवों को माया - जन्म, मृत्यु, बीमारी और बुढ़ापे- के चंगुल से बचाया जाए। इसका मतलब है जन्म और मृत्यु के चक्र को रोकना। यह चक्र तभी रोका जा सकता है जब कोई कृष्ण की पूजा करता है। जैसा कि भगवान ने भगवद-गीता (4.9) में कहा है:
जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति तत्वतः
त्याक्त्वा देहं पुनर् जन्म नाइति माम एति सोऽर्जुन
"हे अर्जुन, जो मेरे प्रकट होने और मेरे कार्यों की दिव्य प्रकृति को जानता है, वह शरीर छोड़ने पर इस भौतिक दुनिया में दोबारा जन्म नहीं लेता है, बल्कि मेरे शाश्वत निवास को प्राप्त करता है।"
जन्म और मृत्यु के चक्र को रोकने के लिए, किसी को भी कृष्ण को वैसा ही समझना होगा जैसा वह हैं। सिर्फ कृष्ण को जानकर ही कोई इस भौतिक दुनिया में पुनर्जन्म की प्रक्रिया को रोक सकता है। कृष्ण भावना में कार्य करने से कोई भगवान के पास लौट सकता है। जीवन की सबसे बड़ी पूर्णता एक पिता, माँ, गुरु, पति या परिवार के किसी भी अन्य सदस्य के लिए यही होती है कि वह दूसरों की भगवान के पास, वापस घर लौटने में मदद करे। यह रिश्तेदारों के लाभ के लिए सबसे ज़्यादा पसंदीदा कल्याणकारी गतिविधि है। इसलिए शचीमाता, हालांकि निमाई पंडित की माँ थीं, श्री चैतन्य महाप्रभु ने सभी तथ्यों पर विचार किया और अपने बेटे को कृष्ण की खोज के लिए जाने देने का फैसला किया। साथ ही, उन्होंने कुछ इंतज़ाम किये ताकि उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु की सभी गतिविधियों की खबर मिलती रहे।
