श्रीवासादि यत प्रभुर विप्र भक्त - गण ।
प्रभुके भिक्षा दिते हैल सबाकार मन ॥168॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
चूँकि अद्वैत आचार्य भगवान चैतन्य महाप्रभु को भिक्षा और भोजन दे रहे थे, इसलिए श्रीवास ठाकुर के नेतृत्व में अन्य भक्तों ने भी उन्हें भिक्षा देने और दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित करने की इच्छा व्यक्त की।
Since Advaita Acharya used to give alms and food to Sri Chaitanya Mahaprabhu, other devotees like Srivas Thakur etc. also wanted to invite him for alms and food.
तात्पर्य
सभी गृहस्थों का यह कर्तव्य है कि यदि कोई सन्यासी उनके पड़ोस या गाँव में आ जाए तो उसे अपने घर बुलाएँ। यह प्रथा आज भी भारत में प्रचलित है। यदि कोई सन्यासी किसी गाँव के आसपास होता है, तो उसे सभी गृहस्वामी एक-एक करके बुलाते हैं। जब तक कोई सन्यासी गाँव में रहता है, वह निवासियों को आध्यात्मिक समझ प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में, सन्यासी को बहुत अधिक यात्रा करने पर भी आवास या भोजन की समस्या नहीं होती। यद्यपि अद्वैत आचार्य चैतन्य महाप्रभु को प्रसाद दे रहे थे, फिर भी नवद्वीप और शांतिपुर के अन्य भक्त भी उन्हें प्रसाद चढ़ाना चाहते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥