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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 167
 
 
श्लोक  2.3.167 
एइ - मत शचीदेवी वात्सल्ये विह्वल ।
हर्ष - भय - दैन्य - भावे हइल विकल ॥167॥
 
 
अनुवाद
जब माता शची भगवान चैतन्य महाप्रभु के प्रति मातृ प्रेम से अभिभूत हो गईं, तो उनमें प्रसन्नता, भय और विनम्रता के साथ-साथ शारीरिक लक्षण भी प्रकट हो गए।
 
Thus, being overwhelmed with maternal love for Sri Chaitanya Mahaprabhu, Sachimata became overwhelmed with joy, fear and humility, and also became filled with physical manifestations.
तात्पर्य
ये श्लोक यह संकेत देते हैं, कि नीलांबर चक्रवर्ती के परिवार में जन्मी माता सती अपने विवाह से पहले ही भगवान विष्णु की उपासना करती आ रही थीं। जैसे कि भगवद्गीता (6.41) में कहा गया है:

"प्राप्य पुण्य-कृतां लोकान्‌ उषित्वा शाश्वतीः समाहः

शुचीनां श्रीमतां गेहे योग-भ्रष्टो ऽभिजाति"

"पवित्र और धनी कुलीनों के परिवार में योगभ्रष्ट व्यक्ति बहुत वर्षों तक पुण्यात्मा जीवों के ग्रहों में भोग-विलास करने के पश्चात् जन्म लेता है।" माता सती, एक नित्य सिद्ध जीव, माता यशोदा की अवतार हैं। वे नीलांबर चक्रवर्ती के घर में प्रकट हुईं और भगवान विष्णु की सेवा में निरंतर लीन रहीं। बाद में उनके पुत्र रूप में स्वयं भगवान विष्णु, श्री चैतन्य महाप्रभु ने अवतार लिया और वे उनके प्रकट होने के दिन से ही उनकी सेवा में अधीन रहीं। यह नित्य-सिद्ध सहयोगियों का पद होता है। इसीलिए श्री नरेंद्र दास ठाकुर गाते हैं: गौरंगेर संगी-गणे नित्य-सिद्ध करि माने। हर भक्त को यह जानना चाहिए, कि श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी सहयोगी - उनके परिवार के सदस्य, मित्र और अन्य सहयोगी - सभी नित्य सिद्ध थे। एक नित्य-सिद्ध भगवान की सेवा को कभी नहीं भूलता। वह बचपन से ही भगवान श्री के हरि के उपासना में सदा व्यस्त रहता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)