"प्राप्य पुण्य-कृतां लोकान् उषित्वा शाश्वतीः समाहः
शुचीनां श्रीमतां गेहे योग-भ्रष्टो ऽभिजाति"
"पवित्र और धनी कुलीनों के परिवार में योगभ्रष्ट व्यक्ति बहुत वर्षों तक पुण्यात्मा जीवों के ग्रहों में भोग-विलास करने के पश्चात् जन्म लेता है।" माता सती, एक नित्य सिद्ध जीव, माता यशोदा की अवतार हैं। वे नीलांबर चक्रवर्ती के घर में प्रकट हुईं और भगवान विष्णु की सेवा में निरंतर लीन रहीं। बाद में उनके पुत्र रूप में स्वयं भगवान विष्णु, श्री चैतन्य महाप्रभु ने अवतार लिया और वे उनके प्रकट होने के दिन से ही उनकी सेवा में अधीन रहीं। यह नित्य-सिद्ध सहयोगियों का पद होता है। इसीलिए श्री नरेंद्र दास ठाकुर गाते हैं: गौरंगेर संगी-गणे नित्य-सिद्ध करि माने। हर भक्त को यह जानना चाहिए, कि श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी सहयोगी - उनके परिवार के सदस्य, मित्र और अन्य सहयोगी - सभी नित्य सिद्ध थे। एक नित्य-सिद्ध भगवान की सेवा को कभी नहीं भूलता। वह बचपन से ही भगवान श्री के हरि के उपासना में सदा व्यस्त रहता है।
