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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.3.127 
निर्वेद, विषाद, हर्ष, चापल्य, गर्व, दैन्य ।
प्रभुर सहित युद्ध करे भाव - सैन्य ॥127॥
 
 
अनुवाद
निराशा, उदासी, प्रसन्नता, बेचैनी, गर्व और विनम्रता के दिव्य आनंदमय लक्षण, सभी भगवान के भीतर सैनिकों की तरह लड़ने लगे।
 
All the symptoms of divine emotions like despair, sadness, joy, agility, pride and humility started fighting like soldiers in the heart of Mahaprabhu.
तात्पर्य
भक्ति-रसामृत-सिंधु में हर्ष का वर्णन किया गया है। हर्ष का अनुभव तब होता है जब अंततः जीवन के वांछित लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है और इसके परिणामस्वरूप बहुत खुश हो जाता है। जब हर्ष उपस्थित होता है तो शरीर कांपता है और शरीर के बाल अंत तक खड़े हो जाते हैं। पसीना, आंसू और जुनून और पागलपन का विस्फोट होता है। मुंह सूज जाता है और व्यक्ति जड़ता और भ्रम का अनुभव करता है। जब एक व्यक्ति अपने वांछित वस्तु को प्राप्त करता है और बहुत भाग्यशाली महसूस करता है, तो उसके शरीर की चमक बढ़ जाती है। अपने स्वयं के गुणों और महानता की भावनाओं के कारण, वह किसी और की परवाह नहीं करता है, और यह अभिमान या गर्व कहलाता है। इस स्थिति में व्यक्ति प्रार्थना करता है और दूसरों की पूछताछ करने के लिए जवाब नहीं देता है। अपने शरीर को देखना, अपनी इच्छाओं को छुपाना और दूसरों के शब्दों पर ध्यान न देना ये अभिमान के परमानंद में दिखाई देने वाले लक्षण हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)