श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  2.3.124 
हा हा प्राण - प्रिय - सखि, कि ना हैल मोरे ।
कानु - प्रेम - विषे मोर तनु - मन जरे ॥124॥
 
 
अनुवाद
मुकुंद ने गाया, "मेरे प्रिय अंतरंग मित्र! मुझे क्या नहीं हुआ है! कृष्ण के प्रति प्रेम के विष के प्रभाव से मेरा शरीर और मन बुरी तरह से पीड़ित हो गया है।
 
Mukunda began to sing, "O my dear friend! What all has happened to me! Both my body and mind are terribly tormented by the poison of Krishna's love."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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