हा हा प्राण - प्रिय - सखि, कि ना हैल मोरे ।
कानु - प्रेम - विषे मोर तनु - मन जरे ॥124॥
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अनुवाद
मुकुंद ने गाया, "मेरे प्रिय अंतरंग मित्र! मुझे क्या नहीं हुआ है! कृष्ण के प्रति प्रेम के विष के प्रभाव से मेरा शरीर और मन बुरी तरह से पीड़ित हो गया है।
Mukunda began to sing, "O my dear friend! What all has happened to me! Both my body and mind are terribly tormented by the poison of Krishna's love."
तात्पर्य
जब मुकुंद ने देखा कि चैतन्य महाप्रभु अत्यंत पीड़ा और विभोरता का प्रदर्शन कर रहे हैं , और वो भी कृष्ण से अलग होने के कारण, उन्होंने श्रीमती राधिका के कृष्ण से मिलन का गान किया। अद्वैत आचार्य ने भी नाचना बंद कर दिया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥