बहुत नाचाइले तुमि, छाड़ नाचान ।
मुकुन्द - हरिदास लइया करह भोजन ॥106॥
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अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "अद्वैत आचार्य, आपने मुझे अनेक प्रकार से नचाया है। अब यह अभ्यास छोड़ दीजिए। मुकुंद और हरिदास के साथ जाकर भोजन ग्रहण कीजिए।"
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "Advaita Acharya, you have made me dance a lot. Now stop doing that. Go and have dinner with Mukunda and Haridasa."
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु यहाँ अद्वैत आचार्य को कह रहे हैं की संन्यासी के लिए उत्तम शैया पर लेटना, लोंग और इलायची चबाना तथा अपने शरीर पर चन्दन का लेप लगाना शोभा नहीं देता है। न ही उसके लिए सुगंधित माला धारण करना और एक शुद्ध वैष्णव के द्वारा अपने पैरों की मालिश कराना उचित है। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, "तुमने मुझे पहले ही अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार नचा लिया है। अब कृपया इसे रोक दो। तुम जाकर मुकुंद और हरिदास के साथ अपना भोजन कर सकते हो।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥