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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  2.25.97 
एइ अर्थ - आमार सूत्रेर व्याख्यानुरूप ।
‘भागवत’ करिब सूत्रेर भाष्य - स्वरूप ॥97॥
 
 
अनुवाद
श्रील व्यासदेव ने विचार किया कि नारद मुनि से ओंकार की व्याख्या के रूप में जो कुछ भी उन्होंने प्राप्त किया था, उसे वे ब्रह्मसूत्र पर भाष्य के रूप में अपनी पुस्तक श्रीमद्भागवतम् में विस्तारपूर्वक समझाएंगे।
 
“Srila Vyasadeva decided that whatever explanation of Omkara he had received from Narada Muni, he would explain it in detail in his book Srimad Bhagavatam as a commentary on Brahma Sutra.”
तात्पर्य
वैदिक ज्ञान की जड़ ओम्कार नामक ध्वनि कंपन है। ओम्कार को महा-वाक्य या सर्वोच्च ध्वनि कहा जाता है। ओम्कार सर्वोच्च ध्वनि जो भी अर्थ है उसे गायत्री मंत्र में और भी अच्छे से समझाया गया है। फिर, यही अर्थ श्रीमद्-भागवतम में चतुः-श्लोकी के नाम से जाने जाने वाले चार श्लोकों में समझाया गया है, जो अहं एवासम एवाग्रे शब्दों से शुरू होता है। भगवान कहते हैं, "सृष्टि से पहले केवल मैं ही विद्यमान था।" इस कथन से चार श्लोक तैयार किए गए हैं और इन्हें चतुः-श्लोकी के नाम से जाना जाता है। इस तरह परमेश्वर भगवान ने भगवान ब्रह्मा को चतुः-श्लोकी के उद्देश्य के बारे में बताया। फिर, भगवान ब्रह्मा ने इसे नारद मुनि को समझाया और नारद मुनि ने इसे श्रील व्यासदेव को समझाया। यह परंपरा प्रणाली है, शिष्य उत्तराधिकार है। वैदिक ज्ञान का भाव, मूल शब्द प्रणव, को श्रीमद्-भागवतम में समझाया गया है। निष्कर्ष यह है कि ब्रह्म-सूत्र को श्रीमद्-भागवतम में समझाया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)