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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  2.25.78 
प्रभु कहे, - ‘विष्णु’ ‘विष्णु’, आमि क्षुद्र जीव हीन ।
जीवे ‘विष्णु’ मानि - एइ अपराध - चिह्न ॥78॥
 
 
अनुवाद
जब प्रकाशानंद सरस्वती ने श्रीमद्भागवतम् के श्लोक का हवाला देकर अपनी बात का समर्थन किया, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरंत भगवान विष्णु का पवित्र नाम लेकर विरोध किया। तब भगवान ने स्वयं को एक अत्यंत पतित जीव के रूप में प्रस्तुत किया और कहा, "यदि कोई पतित बद्धजीव को विष्णु, भगवान या अवतार मानता है, तो वह बहुत बड़ा अपराध करता है।"
 
When Prakashananda Saraswati tried to prove his point by quoting a verse from the Srimad Bhagavatam, Sri Chaitanya Mahaprabhu immediately countered by invoking the name of Lord Vishnu. Then, Mahaprabhu, presenting himself as a fallen soul, said, “If anyone accepts a fallen, conditioned soul as Vishnu, God, or an incarnation, he commits a great sin.”
तात्पर्य
हालाँकि श्री चैतन्य महाप्रभु विष्णु थे, परमात्मा, हमें पाठ सिखाने के लिए फिर भी उन्होंने विष्णु श्रेणी से संबंधित होने से इनकार किया। दुर्भाग्य से, कलि युग में बहुत सारे तथाकथित विष्णु अवतार हैं। लोग यह नहीं जानते कि स्वयं को अवतार के रूप में प्रस्तुत करना सबसे अधिक अपमानजनक है। लोगों को एक सामान्य मनुष्य को भगवान के अवतार के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह भी एक बहुत बड़ा अपराध है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)