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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  2.25.77 
स वै भगवतः श्रीमत्पाद - स्पर्श - हताशुभः ।
भेजे सर्प - वपुर्हित्वा रूपं विद्याधरार्चितम् ॥77॥
 
 
अनुवाद
“श्रीकृष्ण के चरणकमलों का स्पर्श पाकर वह सर्प तुरन्त ही अपने पापमय जीवन के कर्मों से मुक्त हो गया। इस प्रकार उस सर्प ने अपना शरीर त्याग दिया और एक सुंदर विद्याधर देवता का शरीर धारण कर लिया।”
 
"At the touch of Sri Krishna's lotus feet, the snake was instantly freed from the karmic consequences of its sinful life. Thus, the snake abandoned its body and assumed the form of the beautiful Vidyadhara deity."
तात्पर्य
यह श्रीमद् भागवतम (१०.३४. ९) का उद्धरण है। नंद महाराज के नेतृत्व में वृंदावन के निवासी एक बार तीर्थयात्रा पर सरस्वती के तट पर गए। नंद महाराज उपवास कर रहे थे, और वह जंगल के पास लेट गए। उस समय, एक नाग प्रकट हुआ था, जिसे पहले आंगिरस ऋषि ने श्रापित किया था। इस नाग का नाम पहले सुदर्शन था, और वह विद्याधर ग्रह से संबंधित था। हालाँकि, क्योंकि उसने ऋषि के साथ मजाक किया, इसलिए उसे एक बड़े सांप के शरीर को लेने की निंदा की गई। जब इस नाग ने नंद महाराज पर हमला किया, तो नंद महाराज ने पुकारना शुरू किया, "कृष्ण! मदद करें!" कृष्ण तुरंत प्रकट हुए और अपने कमल चरणों से नाग को मारना शुरू किया। प्रभु के कमल चरणों के स्पर्श से, नाग तुरंत अपने पापपूर्ण जीवन की प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो गया। मुक्त होने पर, उसने एक बार फिर सुदर्शन, विद्याधर के अपने मूल रूप को ग्रहण किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)