श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  2.25.68 
कम्प, स्वर - भङ्ग, स्वेद, वैवर्य, स्तम्भ ।
अश्रु - धाराय भिजे लोक, पुलक - कदम्ब ॥68॥
 
 
अनुवाद
भगवान के शरीर में परमानंदपूर्ण आध्यात्मिक परिवर्तन होने लगे। उनका शरीर काँपने लगा और उनकी वाणी लड़खड़ा गई। वे पसीने से तर-बतर हो गए, पीले पड़ गए और लगातार आँसू बहने लगे, जिससे वहाँ खड़े सभी लोग भीग गए। भगवान के शरीर पर फूटे हुए दाने कदंब के फूलों जैसे प्रतीत हो रहे थे।
 
Mahaprabhu's body began to undergo emotional, spiritual transformations. His body began to tremble, and his speech became stilted. He broke out in sweat, turned pale, and his continuous flow of tears drenched all those present. The thrill that coursed through Mahaprabhu's body seemed to resemble the Kadamba flowers.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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