श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.25.66 
निकटे हरि - ध्वनि शुनि’ परकाशानन्द ।
देखिते कौतुके आइला लळा शिष्य - वृन्द ॥66॥
 
 
अनुवाद
जब निकट ही रहने वाले प्रकाशानन्द सरस्वती ने हरे कृष्ण महामंत्र का यह कोलाहलपूर्ण जाप सुना, तो वे और उनके शिष्य तुरन्त भगवान के दर्शन के लिए आये।
 
When Prakashananda Saraswati, who lived nearby, heard the loud sound of the Hare Krishna mantra, he and his disciples immediately came to see Mahaprabhu.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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