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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.25.56 
ताते छय दर्शन हैते ‘तत्त्व’ नाहि जानि ।
‘महाजन’ येइ कहे, सेइ ‘सत्य’ मानि ॥56॥
 
 
अनुवाद
"छह दार्शनिक सिद्धांतों का अध्ययन करके परम सत्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम महाजनों, अधिकारियों के मार्ग का अनुसरण करें। वे जो कुछ भी कहते हैं, उसे परम सत्य मानकर स्वीकार करना चाहिए।"
 
"The ultimate truth cannot be reached by studying the six philosophical schools. Therefore, it is our duty to follow the path of the great sages. Whatever they say should be accepted as the ultimate truth."
तात्पर्य
अपने अमृत-प्रवाह-भाष्य में, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने निम्नलिखित दार्शनिक प्रक्रियाओं का सारांश दिया है। प्रकाशानंद ने स्वीकार किया कि श्रीपाद शंकराचार्य, अपने अद्वैत के दर्शन को प्रतिष्ठित करने के लिए बहुत उत्सुक होने के कारण, वेदांत दर्शन का आश्रय लेते थे और उसे अपने ढंग से समझाने का प्रयास करते थे। हालांकि, तथ्य यह है कि यदि कोई ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करता है, तो वह निश्चित रूप से अद्वैत के सिद्धांत को स्थापित नहीं कर सकता है। इस कारण से शंकराचार्य ने वेद के सभी प्रकार के साहित्य का खंडन किया जो भगवान के व्यक्तित्व के सर्वोच्चता को स्थापित करते हैं। विभिन्न तरीकों से, शंकराचार्य ने वैदिक साहित्य का खंडन करने का प्रयास किया है। दुनिया भर में, शंकराचार्य के पदचिह्नों पर चलने वाले निन्यानबे प्रतिशत दार्शनिक भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। इसके बजाय वे अपनी राय स्थापित करने का प्रयास करते हैं। अपनी राय स्थापित करने और दूसरों का खंडन करना सांसारिक दार्शनिकों का विशिष्ट गुण है। इसलिए: (1) मीमांसा दार्शनिक, जैमिनी के सिद्धांतों का पालन करते हुए, फलदायी गतिविधि पर जोर देते हैं और कहते हैं कि यदि कोई ईश्वर है, तो उसे फलदायी गतिविधि के नियमों के अधीन होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, यदि कोई भौतिक दुनिया में अपने कर्तव्यों को बहुत अच्छी तरह से निभाता है, तो ईश्वर उसे वांछित परिणाम देने के लिए बाध्य है। इन दार्शनिकों के अनुसार, भगवान का भक्त बनने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि कोई नैतिक सिद्धांतों का सख्ती से पालन करता है, तो प्रभु उसे मान्यता देंगे, जो वांछित इनाम देंगे। ऐसे दार्शनिक भक्ति-योग का वैदिक सिद्धांत स्वीकार नहीं करते हैं। इसके बजाय, वे अपने निर्धारित कर्तव्य का पालन करने पर जोर देते हैं। (2) कपिल जैसे नास्तिक सांख्य दार्शनिक भौतिक तत्वों का बहुत गंभीरता से विश्लेषण करते हैं और इस तरह इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि भौतिक प्रकृति ही सब कुछ का कारण है। वे ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व को सभी कारणों के कारण के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। (3) गौतम और कणाद जैसे न्याय दार्शनिकों ने सृष्टि के मूल कारण के रूप में परमाणुओं के एक संयोजन को स्वीकार किया है। (4) मायावादी दार्शनिक कहते हैं कि सब कुछ एक भ्रम है। अष्टावक्र जैसे दार्शनिकों के नेतृत्व में, वे हर चीज के कारण के रूप में अवैयक्तिक ब्रह्म तेज पर जोर देते हैं। (5) पतंजलि के उपदेशों का पालन करने वाले दार्शनिक राज-योग का अभ्यास करते हैं। वे कई रूपों के भीतर परम सत्य के एक रूप की कल्पना करते हैं। वह आत्म-साक्षात्कार की उनकी प्रक्रिया है।

ये सभी पाँच दर्शन भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की प्रधानता को पूरी तरह से अस्वीकार करते हैं और अपने स्वयं के दार्शनिक सिद्धांतों को स्थापित करने का प्रयास करते हैं। हालाँकि, श्रील व्यासदेव ने वेदांत-सूत्र लिखा और, सभी वैदिक साहित्य का सार लेते हुए, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की सर्वोच्चता स्थापित की। ऊपर वर्णित सभी पाँच प्रकार के दार्शनिक यह समझते हैं कि अवैयक्तिक ब्रह्म भौतिक गुणों से रहित है, और उनका मानना है कि जब भगवान का व्यक्तित्व प्रकट होता है, तो वह भौतिक गुणों से दूषित और आच्छादित होता है। उपयोग किया जाने वाला तकनीकी शब्द सगुण है। वे सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म की बात करते हैं। उनके लिए, निर्गुण ब्रह्म का अर्थ है "बिना किसी भौतिक गुणों के अवैयक्तिक परम सत्य" और सगुण ब्रह्म का अर्थ है "परम सत्य जो भौतिक गुणों के संदूषण को स्वीकार करता है।" कमोबेश, इस प्रकार के दार्शनिक अटकलों को मायावाद दर्शन कहा जाता है। हालाँकि, तथ्य यह है कि परम सत्य का भौतिक गुणों से कभी कोई लेना-देना नहीं होता क्योंकि वह पारलौकिक है। वह हमेशा पूर्ण आध्यात्मिक गुणों से परिपूर्ण रहता है। ऊपर वर्णित पाँच दार्शनिक भगवान विष्णु को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं, लेकिन वे अन्य स्कूलों के दर्शनों का खंडन करने में बहुत व्यस्त हैं। भारत में छह प्रकार की दार्शनिक प्रक्रियाएँ हैं। क्योंकि व्यासदेव वैदिक प्राधिकारी हैं, इसलिए उन्हें वेदव्यास के नाम से जाना जाता है। वेदांत-सूत्र के उनके दार्शनिक स्पष्टीकरण को भक्तों द्वारा स्वीकार किया जाता है। जैसा कि कृष्ण ने भगवद-गीता (15.15) में पुष्टि की है:

सर्वस्य चाऽहम हृदि सन्निविष्टो

 मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम अपोहनं च

वेदैश्च सर्वैर अहं एव वेद्यो

 वेदान्त-कृद् वेद-विद् एव चाऽहम

“मैं सबके हृदय में स्थित हूँ, और मुझसे ही स्मरण, ज्ञान और विस्मृति आती है। सभी वेदों द्वारा मुझे जाना जा सकता है; वास्तव में, मैं वेदान्त का संकलनकर्ता हूँ, और मैं वेदों का ज्ञाता हूँ।”

सभी वैदिक साहित्य के अध्ययन का परम लक्ष्य भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में कृष्ण की स्वीकृति है। कृष्ण चेतना आंदोलन श्रील व्यासदेव के दार्शनिक निष्कर्ष का प्रचार कर रहा है और अन्य महान आचार्यों जैसे रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य, विष्णु स्वामी, निम्बार्क और स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु का अनुसरण कर रहा है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)