ये सभी पाँच दर्शन भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की प्रधानता को पूरी तरह से अस्वीकार करते हैं और अपने स्वयं के दार्शनिक सिद्धांतों को स्थापित करने का प्रयास करते हैं। हालाँकि, श्रील व्यासदेव ने वेदांत-सूत्र लिखा और, सभी वैदिक साहित्य का सार लेते हुए, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की सर्वोच्चता स्थापित की। ऊपर वर्णित सभी पाँच प्रकार के दार्शनिक यह समझते हैं कि अवैयक्तिक ब्रह्म भौतिक गुणों से रहित है, और उनका मानना है कि जब भगवान का व्यक्तित्व प्रकट होता है, तो वह भौतिक गुणों से दूषित और आच्छादित होता है। उपयोग किया जाने वाला तकनीकी शब्द सगुण है। वे सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म की बात करते हैं। उनके लिए, निर्गुण ब्रह्म का अर्थ है "बिना किसी भौतिक गुणों के अवैयक्तिक परम सत्य" और सगुण ब्रह्म का अर्थ है "परम सत्य जो भौतिक गुणों के संदूषण को स्वीकार करता है।" कमोबेश, इस प्रकार के दार्शनिक अटकलों को मायावाद दर्शन कहा जाता है। हालाँकि, तथ्य यह है कि परम सत्य का भौतिक गुणों से कभी कोई लेना-देना नहीं होता क्योंकि वह पारलौकिक है। वह हमेशा पूर्ण आध्यात्मिक गुणों से परिपूर्ण रहता है। ऊपर वर्णित पाँच दार्शनिक भगवान विष्णु को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं, लेकिन वे अन्य स्कूलों के दर्शनों का खंडन करने में बहुत व्यस्त हैं। भारत में छह प्रकार की दार्शनिक प्रक्रियाएँ हैं। क्योंकि व्यासदेव वैदिक प्राधिकारी हैं, इसलिए उन्हें वेदव्यास के नाम से जाना जाता है। वेदांत-सूत्र के उनके दार्शनिक स्पष्टीकरण को भक्तों द्वारा स्वीकार किया जाता है। जैसा कि कृष्ण ने भगवद-गीता (15.15) में पुष्टि की है:
सर्वस्य चाऽहम हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम अपोहनं च
वेदैश्च सर्वैर अहं एव वेद्यो
वेदान्त-कृद् वेद-विद् एव चाऽहम
“मैं सबके हृदय में स्थित हूँ, और मुझसे ही स्मरण, ज्ञान और विस्मृति आती है। सभी वेदों द्वारा मुझे जाना जा सकता है; वास्तव में, मैं वेदान्त का संकलनकर्ता हूँ, और मैं वेदों का ज्ञाता हूँ।”
सभी वैदिक साहित्य के अध्ययन का परम लक्ष्य भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में कृष्ण की स्वीकृति है। कृष्ण चेतना आंदोलन श्रील व्यासदेव के दार्शनिक निष्कर्ष का प्रचार कर रहा है और अन्य महान आचार्यों जैसे रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य, विष्णु स्वामी, निम्बार्क और स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु का अनुसरण कर रहा है।
