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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.25.42 
एइ त’ कल्पित अर्थ मने नाहि भाय ।
शास्त्र छा ड़ि’ कुकल्पना पाषण्डे बुझाय ॥42॥
 
 
अनुवाद
श्रीपाद शंकराचार्य ने अपनी व्याख्या और काल्पनिक अर्थ दिया है। यह वास्तव में किसी भी समझदार व्यक्ति के मन को भाता नहीं है। उन्होंने नास्तिकों को समझाने और उन्हें अपने वश में करने के लिए ऐसा किया है।
 
"Sripada Shankaracharya has given his own interpretation and imaginary meaning. This is unacceptable to any sensible person. He has done this to convince and control atheists."
तात्पर्य
श्रीपाद शंकराचार्य का प्रचार बुद्ध के नास्तिक दर्शन का विरोध करता था। भगवान बुद्ध का उद्देश्य नास्तिकों को पशुओं की हत्या के पाप से रोकना था। नास्तिक ईश्वर को समझ नहीं सकते; इसलिए भगवान बुद्ध प्रकट हुए और नास्तिकों को पशुओं को मारने से रोकने के लिए अहिंसा का दर्शन फैलाया। जब तक कोई पशु-हत्या के पाप से मुक्त नहीं हो जाता, वह धर्म या ईश्वर को नहीं समझ सकता। यद्यपि भगवान बुद्ध कृष्ण के अवतार थे, पर उन्होंने ईश्वर के बारे में नहीं बोला, क्योंकि लोग समझने में असमर्थ थे। वह केवल पशु-हत्या बंद करना चाहते थे। श्रीपाद शंकाराचार्य आध्यात्मिक पहचान की प्रधानता स्थापित करना चाहते थे; इसलिए वह नास्तिकों को वैदिक साहित्यों की एक काल्पनिक व्याख्या के माध्यम से परिवर्तित करना चाहते थे। ये आचार्यों के रहस्य हैं। कभी-कभी वे वेदों के वास्तविक तात्पर्य को छुपाते हैं और वेदों की व्याख्या एक अलग तरह से करते हैं। कभी-कभी वे केवल नास्तिकों को अपने नियंत्रण में लाने के लिए एक अलग सिद्धांत का उच्चारण करते हैं। इस प्रकार यह कहा जाता है कि शंकर का दर्शन पाषंडों, नास्तिकों के लिए है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)