श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.25.42 
एइ त’ कल्पित अर्थ मने नाहि भाय ।
शास्त्र छा ड़ि’ कुकल्पना पाषण्डे बुझाय ॥42॥
 
 
अनुवाद
श्रीपाद शंकराचार्य ने अपनी व्याख्या और काल्पनिक अर्थ दिया है। यह वास्तव में किसी भी समझदार व्यक्ति के मन को भाता नहीं है। उन्होंने नास्तिकों को समझाने और उन्हें अपने वश में करने के लिए ऐसा किया है।
 
"Sripada Shankaracharya has given his own interpretation and imaginary meaning. This is unacceptable to any sensible person. He has done this to convince and control atheists."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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