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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.25.35 
चिदानन्द कृष्ण - विग्रह ‘मायिक’ करि’ मानि ।
एइ बड़ ‘पाप’, - सत्य चैतन्येर वाणी ॥35॥
 
 
अनुवाद
"मायावादी भगवान के साकार रूप को आध्यात्मिक और आनंद से परिपूर्ण नहीं मानते। यह एक महान पाप है। श्री चैतन्य महाप्रभु के कथन वास्तव में तथ्यात्मक हैं।"
 
"The Mayavadis do not accept the physical form of the Lord as spiritual and blissful. This is a grave sin. The statements of Sri Chaitanya Mahaprabhu are truly authoritative."
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु का आंदोलन विशेष रुप से मायावादी निष्कर्ष को पराजित करने पर केंद्रित है जो परम सत्य का है। मायावादी स्कूल के सदस्य प्रभु के भगवत स्वरुप को समझ नहीं पाते, इसलिए वे यह गलत मानते हैं कि प्रभु का स्वरुप भी भौतिक ऊर्जा से निर्मित है। वे मानते हैं कि अन्य जीवित प्राणियों की तरह, प्रभु का आवरण भी एक भौतिक शरीर है। इस आपत्तिजनक समझ के कारण वे यह पहचान नहीं पाते कि श्री कृष्ण का व्यक्तिगत स्वरुप अलौकिक है, भौतिक नहीं। उनका निष्कर्ष प्रभु के चरणकमलों पर एक महान अपराध है। जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने समझाया, श्री कृष्ण का अपना शाश्वत आनंदमय रूप है जो ज्ञान से पूर्ण है। सभी वैष्णव आचार्य इसे स्वीकार करते हैं। यह परम सत्य की उचित समझ है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)