श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.25.33 
‘ब्रह्म’ - शब्दे कहे ‘षड् - ऐश्वर्य - पूर्ण भगवान्’ ।
ताँरे ‘निर्विशेष’ स्थापि, ‘पूर्णता’ हय हान ॥33॥
 
 
अनुवाद
"'ब्रह्म' ['सर्वोच्च'] शब्द भगवान के परम व्यक्तित्व को इंगित करता है, जो सभी छह ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं। लेकिन यदि हम एकांगी निर्विशेषवादी दृष्टिकोण अपनाएँ, तो उनकी पूर्णता क्षीण हो जाती है।"
 
"The word 'Brahma' (the greatest) refers to the Supreme Personality of Godhead, who is endowed with the six opulences. But if we accept the one-sided impersonal view, His perfection is diminished."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas