श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.25.31 
यः - सृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवल - बोध - लब्धये ।
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूल - तुषावघातिनाम् ॥31॥
 
 
अनुवाद
"हे प्रभु, आपकी भक्ति ही एकमात्र कल्याणकारी मार्ग है। यदि कोई इसे केवल काल्पनिक ज्ञान के लिए या यह समझकर त्याग देता है कि ये जीवात्माएँ आत्माएँ हैं और भौतिक जगत मिथ्या है, तो उसे बहुत कष्ट सहना पड़ता है। उसे केवल कष्टदायक और अशुभ कर्म ही प्राप्त होते हैं। उसके कर्म चावल रहित भूसी को कूटने के समान हैं। उसका श्रम निष्फल हो जाता है।"
 
"O Lord, devotion to You is the only auspicious path. If one abandons it for mere dry knowledge or for the belief that all beings are souls and the material world is false, he suffers greatly. He receives only painful and inauspicious deeds. His actions are like beating straw that is devoid of grain. All his labor is fruitless."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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