श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 278
 
 
श्लोक  2.25.278 
ये लीला - अमृत विने, खाय यदि अन्न - पाने,
तबे भक्तेर दुर्बल जीवन ।
यार एक - बिन्दु - पाने, उत्फुल्लित तनु - मने,
हासे, गाय, करये नर्तन ॥278॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य पर्याप्त अन्न खाकर बलवान और हृष्ट-पुष्ट बनते हैं, किन्तु जो भक्त केवल साधारण अन्न खाता है, किन्तु भगवान चैतन्य महाप्रभु और कृष्ण की दिव्य लीलाओं का रसपान नहीं करता, वह धीरे-धीरे दुर्बल होकर दिव्य पद से गिर जाता है। किन्तु, यदि कोई कृष्ण की लीलाओं के अमृत की एक बूँद भी पी ले, तो उसका तन-मन खिल उठता है, और वह हँसने, गाने और नाचने लगता है।
 
People become healthy and strong by eating enough food, but a devotee who eats only ordinary food and does not savor the transcendental pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu and Krishna gradually becomes weak and falls from the divine position. But if one drinks even a drop of the nectar of Krishna's pastimes, his body and mind become cheerful and he begins to laugh, sing, and dance.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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