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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 277
 
 
श्लोक  2.25.277 
चैतन्य - लीला - अमृत - पूर, कृष्ण - लीला - सुकर्पूर
दुहे मिलि’ हय सुमाधुर्य ।
साधु - गुरु - प्रसादे, ताहा येइ आस्वादे
सेइ जाने माधुर्य - प्राचुर्य ॥277॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अमृतमय हैं और भगवान कृष्ण की लीलाएँ कपूर के समान हैं। जब इन्हें मिलाया जाता है, तो इनका स्वाद बहुत मीठा होता है। शुद्ध भक्तों की कृपा से, जो भी इनका स्वाद लेता है, वह उस मधुरता की गहराई को समझ सकता है।
 
The pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu are full of nectar and the pastimes of Sri Krishna are like camphor.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)