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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 271
 
 
श्लोक  2.25.271 
कृष्ण - लीला अमृत - सार, तार शत शत धार
दश - दिके वहे याहा हैते ।
से चैतन्य - लीला हय, सरोवर अक्षय
मनो - हंस चराह’ ताहाते ॥271॥
 
 
अनुवाद
भगवान कृष्ण की लीलाएँ समस्त अमृत का सार हैं और वह अमृत सैकड़ों नदियों में सभी दिशाओं में प्रवाहित हो रहा है। श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ एक शाश्वत जलाशय हैं और मनुष्य को सलाह दी जाती है कि वह अपने मन को इस दिव्य सरोवर में हंस की तरह तैरने दे।
 
Krishna's pastimes are the essence of all nectar, and that nectar flows in hundreds of streams in all directions. Sri Chaitanya Mahaprabhu's pastimes are the eternal lake. One should allow the swan of the mind to swim in this divine lake.
तात्पर्य
आध्यात्मिक ज्ञान का सार श्री चैतन्य महाप्रभु के लीलाओं में निहित है, जो कि भगवान श्री कृष्ण के लीलाओं के समान है। यही ज्ञान का सार है। यदि ज्ञान में श्री चैतन्य महाप्रभु और कृष्ण की समझ शामिल नहीं है, तो यह निरर्थक है। श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से, भगवान श्री कृष्ण के लीलाओं का अमृत सैकड़ों और हजारों नदियों में विभिन्न दिशाओं में प्रवाहित हो रहा है। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएं कृष्ण की लीलाओं से अलग हैं। ऐसा कहा जाता है, श्री-कृष्ण-चैतन्य, राधा-कृष्ण नहे अन्य: "भगवान चैतन्य महाप्रभु राधा और कृष्ण का संयोजन है।" इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को समझे बिना, कोई राधा और कृष्ण को नहीं समझ सकता। इसलिए श्रील नरसिंह दास ठाकुर गाते हैं, रूप-रघुनाथ-पद हेबे आकुति / काबे हम बुझाबा से युगल पीरिति: "कब मैं छह गोस्वामी द्वारा छोड़ी गई पुस्तकों का अध्ययन करने के लिए बहुत उत्सुक होऊंगा? तब मैं राधा और कृष्ण के संयुग्म लीलाओं को समझ पाऊंगा।" चैतन्य महाप्रभु ने सीधे श्रील रूप गोस्वामी और श्रील सनातन गोस्वामी को सशक्त किया। उनके कदमों का अनुसरण करते हुए, अन्य गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके मिशन को समझते थे। किसी को भी श्री कृष्ण चैतन्य और भगवान श्री कृष्ण को परंपरा प्रणाली में छह गोस्वामियों से समझना चाहिए। कृष्ण चेतना आंदोलन गोस्वामियों के नक्शेकदम पर यथासंभव सख्ती से चल रहा है। नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं, ई चया गोसानी यांरा, मुई तांरा दास: "मैं छह गोस्वामियों का सेवक हूं।" कृष्ण चेतना का दर्शन भगवान के सेवक के सेवक का सेवक बनना है। जो कोई भी कृष्ण-कथा के कठिन विषय को समझना चाहता है, उसे शिष्य-परंपरा को स्वीकार करना चाहिए। यदि कोई किसी तरह कृष्ण को समझने में सक्षम है, तो उसका जीवन सफल है। त्याक्त देहम पुनर जन्म नाति माम एति सो अर्जुन। एक पूर्ण भक्त शिष्य-परंपरा के माध्यम से कृष्ण को समझने में सक्षम है, और ईश्वर के राज्य में उसका प्रवेश निश्चित रूप से खुला है। जब कोई कृष्ण को समझता है, तो खुद को आध्यात्मिक राज्य में स्थानांतरित करने में कोई कठिनाई नहीं होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)