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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 270
 
 
श्लोक  2.25.270 
इहार प्र सादे पाइबा कृष्ण - तत्त्व - सार ।
सर्व - शास्त्र - सिद्धान्तेर इहाँ पाइबा पार ॥270॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को समझकर, मनुष्य कृष्ण के सत्य को समझ सकता है। कृष्ण को समझकर, मनुष्य विभिन्न शास्त्रों में वर्णित समस्त ज्ञान की सीमा को समझ सकता है।
 
By understanding the pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu, one can understand the truth about Krishna. And by understanding Krishna, one can grasp the limits of all the knowledge described in the various authoritative scriptures.
तात्पर्य
जैसा कि भगवान कृष्ण भगवत-गीता (7.3) में कहते हैं:

मानुषाणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्दये

यततां अपि सिद्दानं कश्चिन माम वेत्ति तत्त्वतः

"हज़ारों मनुष्यों में, शायद ही कोई एक पूर्णता के लिए प्रयास करता है, और जो पूर्णता को प्राप्त कर लेते हैं, मुश्किल से ही कोई मुझे सच में जानता है।"

कृष्ण को समझना बहुत कठिन है, लेकिन यदि कोई चैतन्य महाप्रभु के भक्ति पंथ के माध्यम से श्रीमद-भागवतम को समझने की कोशिश करता है, तो निस्संदेह कृष्ण को बहुत आसानी से समझ लेगा। यदि किसी तरह कोई कृष्ण को समझ लेता है, तो उसका जीवन सफल होता है। पुनः, जैसा कि कृष्ण भगवत-गीता (4.9) में कहते हैं:

जन्म कर्म च मे दिव्यं एवम् यो वेत्ति तत्वतः

त्यक्त्वा देहं पुनर् जनम नैति माम एति सोर्जुन

"हे अर्जुन, जो मेरे प्रकट होने और कृत्यों की पारलौकिक प्रकृति को जानता है, शरीर छोड़ने पर, इस भौतिक संसार में फिर से जन्म नहीं लेता है, बल्कि मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त होता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)