Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 267
 
 
श्लोक  2.25.267 
भक्त ला गि’ विस्तारिला आपन - वदने ।
काहाँ भक्त - मुखे कहाई शुनिला आपने ॥267॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीमद्भागवतम् का तात्पर्य प्रसारित किया। वे कभी अपने भक्तों के लाभ के लिए बोलते थे, तो कभी अपने किसी भक्त को बोलते हुए स्वयं सुनते थे।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu preached the message of the Srimad Bhagavatam. Sometimes he personally preached for the benefit of his devotees, and sometimes he empowered a devotee to speak and listened.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु, एक आदर्श गुरु या आचार्य के रूप में, स्वयं श्रीमद्-भागवतम् को बहुत विस्तृत रूप से समझाया करते थे। कभी-कभी वह अपने भक्तों को भी बोलने का अधिकार देते थे जबकि वे स्वयं सुनते थे। इस तरह एक आचार्य को अपने शिष्यों को प्रशिक्षित करना चाहिए। न केवल उन्हें भागवत पंथ का व्यक्तिगत रूप से वर्णन करना चाहिए, बल्कि उन्हें इस महान विषय पर बात करने के लिए अपने शिष्यों को प्रशिक्षित भी करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)