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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 264
 
 
श्लोक  2.25.264 
जीव निस्तारिते प्रभु भ्रमिला देशे - देशे ।
आपने आस्वादि’ भक्ति करिला प्रकाशे ॥264॥
 
 
अनुवाद
सभी पतित आत्माओं का उद्धार करने के लिए, भगवान ने देश-देश भ्रमण किया। उन्होंने स्वयं भक्ति के दिव्य आनंद का अनुभव किया और साथ ही, उन्होंने भक्ति-पंथ का सर्वत्र प्रचार-प्रसार किया।
 
Mahaprabhu traveled across the country to liberate all fallen souls. He personally experienced the divine joy of devotion and simultaneously spread the devotional doctrine throughout the world.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं भारत के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा की ताकि पूरे देश में भक्ति पंथ का प्रसार हो सके। उन्होंने स्वयं भी पारलौकिक क्रियाकलापों का आनंद लिया। अपने व्यक्तिगत व्यवहार से उन्होंने भक्तों के अनुसरण के लिए एक उदाहरण दिया है। अर्थात, भक्ति सेवा का पंथ प्रसारित करना चाहिए। उन्होंने विशिष्ट रूप से अपने भक्तों को निर्देश दिया कि वे सभी भारतीयों को इस संदेश को दुनिया भर में प्रसारित करने के लिए प्रोत्साहित करें क्योंकि उस समय भगवान स्वयं दुनिया के अन्य हिस्सों की यात्रा नहीं कर सके। इस संबंध में, उन्होंने दो निर्देश छोड़े हैं:

भारत-भूमिते हैल मानुषय-जन्म यारा

जनम सारथक करि करा पर-उपकार

"सभी भारतीयों को श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ को गंभीरता से अपनाना चाहिए और भक्ति सेवा की प्रक्रिया को अपनाकर अपने जीवन को सिद्ध करना चाहिए। अपने जीवन को सिद्ध करने के बाद, उन्हें सभी मनुष्यों [पर-उपकार] के कल्याण हेतु इस संदेश को पूरी दुनिया में प्रसारित करना चाहिए।" (स.च. आदि 9.41) एक वैष्णव विशेष रूप से पर-उपकार, दूसरों का भला करने में रुचि रखता है। प्रह्लाद महाराज भी इसमें रुचि रखते थे। वह अकेले नहीं उद्धार पाना चाहते थे; बल्कि, वह सभी पतित आत्माओं को उद्धार दिलाना चाहते थे, जो भक्ति के ज्ञान से वंचित हैं और अपनी बुद्धि का उपयोग भौतिक शरीर के अस्थायी लाभ के लिए करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु भी अपने मिशन को पूरे विश्व में फैलाना चाहते थे।

पृथिवीते आछे यता नगर आदि ग्राम

सर्वत्र प्रचार हैबे मोरा नाम

"प्रत्येक शहर और गाँव में मेरे नाम का जाप सुना जाएगा।" (चैतन्य-भागवत, अंत्य 4.126)

श्री चैतन्य महाप्रभु के पदचिह्नों पर चलते हुए, हम उनके संदेश को दुनिया भर में प्रसारित करने का प्रयास कर रहे हैं। उनकी कृपा से, लोग इस आंदोलन को बहुत गंभीरता से ले रहे हैं। वास्तव में, पश्चिमी देशों में, विशेष रूप से अमेरिका और यूरोप में हमारी पुस्तकों का व्यापक वितरण किया जाता है। यहाँ तक ​​कि इन देशों में चर्च भी कृष्ण भावना आंदोलन का मूल्य समझ रहे हैं और मानव समाज के सर्वोच्च लाभ के लिए एकजुट होने के लिए तैयार हैं। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी इस आंदोलन को गंभीरता से ले सकते हैं और इसे पूरे विश्व में, गाँव से गाँव और शहर से शहर तक प्रसारित कर सकते हैं, जैसा कि स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने किया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)