भारत-भूमिते हैल मानुषय-जन्म यारा
जनम सारथक करि करा पर-उपकार
"सभी भारतीयों को श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ को गंभीरता से अपनाना चाहिए और भक्ति सेवा की प्रक्रिया को अपनाकर अपने जीवन को सिद्ध करना चाहिए। अपने जीवन को सिद्ध करने के बाद, उन्हें सभी मनुष्यों [पर-उपकार] के कल्याण हेतु इस संदेश को पूरी दुनिया में प्रसारित करना चाहिए।" (स.च. आदि 9.41) एक वैष्णव विशेष रूप से पर-उपकार, दूसरों का भला करने में रुचि रखता है। प्रह्लाद महाराज भी इसमें रुचि रखते थे। वह अकेले नहीं उद्धार पाना चाहते थे; बल्कि, वह सभी पतित आत्माओं को उद्धार दिलाना चाहते थे, जो भक्ति के ज्ञान से वंचित हैं और अपनी बुद्धि का उपयोग भौतिक शरीर के अस्थायी लाभ के लिए करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु भी अपने मिशन को पूरे विश्व में फैलाना चाहते थे।
पृथिवीते आछे यता नगर आदि ग्राम
सर्वत्र प्रचार हैबे मोरा नाम
"प्रत्येक शहर और गाँव में मेरे नाम का जाप सुना जाएगा।" (चैतन्य-भागवत, अंत्य 4.126)
श्री चैतन्य महाप्रभु के पदचिह्नों पर चलते हुए, हम उनके संदेश को दुनिया भर में प्रसारित करने का प्रयास कर रहे हैं। उनकी कृपा से, लोग इस आंदोलन को बहुत गंभीरता से ले रहे हैं। वास्तव में, पश्चिमी देशों में, विशेष रूप से अमेरिका और यूरोप में हमारी पुस्तकों का व्यापक वितरण किया जाता है। यहाँ तक कि इन देशों में चर्च भी कृष्ण भावना आंदोलन का मूल्य समझ रहे हैं और मानव समाज के सर्वोच्च लाभ के लिए एकजुट होने के लिए तैयार हैं। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी इस आंदोलन को गंभीरता से ले सकते हैं और इसे पूरे विश्व में, गाँव से गाँव और शहर से शहर तक प्रसारित कर सकते हैं, जैसा कि स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने किया था।
