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श्लोक 238
श्लोक
2.25.238
एइ त कहिलुँ, - प्रभु देखि’ वृन्दावन ।
पुनः करिलेन यैछे नीलाद्रि गमन ॥238॥
अनुवाद
इस प्रकार मैंने वर्णन किया है कि कैसे श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन से जगन्नाथ पुरी लौटे।
This is how I have described how Sri Chaitanya Mahaprabhu returned from Vrindavan to Jagannatha Puri.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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