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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 206
 
 
श्लोक  2.25.206 
दुःखी वैष्णव देखि’ ताँरे करान भोजन ।
गौड़ीया आइले दधि, भात, तैल - मर्दन ॥206॥
 
 
अनुवाद
सुबुद्धि राय अपनी बचत मथुरा आने वाले बंगाली वैष्णवों को दही खिलाने में खर्च करते थे। वे उन्हें पके हुए चावल भी खिलाते थे और तेल से मालिश भी करते थे। जब वे किसी दरिद्र वैष्णव को देखते, तो वे अपनी कमाई से उसे भोजन कराते थे।
 
Subuddhi Rai used his savings to buy yogurt for Bengali Vaishnavas visiting Mathura. He would give them cooked rice (bhaat) and oil for massage. Whenever he saw a distressed Vaishnava, he would use his money to feed them.
तात्पर्य
बंगाली वैष्णवों के पालन-पोषण के लिए एक विशेष संदर्भ है। एक गौड़ीय वैष्णव एक बंगाली वैष्णव हैं। उस समय भगवान चैतन्य के अधिकांश भक्त बंगाल और उड़ीसा के निवासी गौड़ और उड़ीसा थे। बंगाल और उड़ीसा में अभी भी उनके हजारों-लाखों अनुयायी हैं। बंगाली मुख्य भोजन के रूप में पके हुए चावल खाने के अभ्यस्त हैं। जब वे उत्तर में मथुरा गए, तो उन्होंने पाया कि लोग आमतौर पर गेहूं से बनी चपातियाँ या रोटियाँ खाते हैं। बंगाली इस भोजन को पचा नहीं सके क्योंकि वे पके हुए चावल के अभ्यस्त थे। इसलिए जैसे ही सुबुद्धि राय ने मथुरा में एक बंगाली वैष्णव को आते देखा, वह उसे पका हुआ चावल देने का प्रयास करेगा। बंगाली भी सरसों का तेल से मालिश करने के आदी हैं। किसी भी मामले में, सुबुद्धि राय वैष्णवों को उनकी ज़रूरतों के अनुसार सेवा करना चाहते थे। इसलिए वह विशेष रूप से गेहूं से बनी चपातियाँ और रोटियों को पचाने में आसानी के लिए दही की आपूर्ति करेगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)