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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 196
 
 
श्लोक  2.25.196 
केह कहे , - एइ नहे, ‘अल्प’ दोष हय ।
शुनिया रहिला राय करिया संशय ॥196॥
 
 
अनुवाद
जब सुबुद्धि राय ने कुछ अन्य ब्राह्मणों से परामर्श किया, तो उन्होंने उसे बताया कि उसने कोई गंभीर अपराध नहीं किया है, इसलिए उसे गर्म घी पीकर प्राण त्यागने नहीं चाहिए। परिणामस्वरूप, सुबुद्धि राय को संशय हुआ कि क्या किया जाए।
 
When Subuddhi Rai asked some other Brahmins, they said that he had not committed any sin, and therefore he should not drink the hot ghee and die. Consequently, Subuddhi Rai was unsure about what he should do.
तात्पर्य
यह हिन्दू रीति का ही दूसरा उदाहरण है एक ब्राह्मण एक विशेष दोष को क्षमा करते हुए सलाह देता और दूसरा उसके विपरीत सलाह देता। सर्वसामान्यत: वकील और वैद्य भी एक-एक प्रकार की शिक्षा देते हुए अलग-अलग राय रखते हैं। ब्राह्मणों के इस मतभेद के कारण सुबुद्धि राय और अधिक संशय में फँस गए। वे समझ ही न पा रहे थे कि क्या करें और क्या न करें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)