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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 183
 
 
श्लोक  2.25.183 
काँथा - करङ्गिया मोर काङ्गाल भक्तगण ।
वृन्दावने आइले ताँदेर करिह पालन ॥183॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी से कहा, "वृंदावन जाने वाले मेरे सभी भक्त सामान्यतः बहुत गरीब होते हैं। उनमें से प्रत्येक के पास एक फटी हुई रजाई और एक छोटे से जलपात्र के अलावा कुछ नहीं होता। इसलिए, सनातन, आपको उन्हें आश्रय देना चाहिए और उनका भरण-पोषण करना चाहिए।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said to Sanatana Goswami, "All my devotees who go to Vrindavan are generally very poor. They have only a torn quilt and a small kamandalu (water pot). Therefore, O Sanatana, you should provide them with shelter and care."
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु की तरह हमने वृंदावन और नबद्वीप के मायापुर में मंदिरों का निर्माण विदेश से यूरोप और अमेरिका से आने वाले भक्तों को शरण देने के लिए ही किया है। हरे कृष्ण आंदोलन शुरु होने के बाद से ही कई यूरोपियन और अमेरिकन वृंदावन आते रहे हैं, लेकिन वहाँ किसी आश्रम या मंदिर ने उनका उचित स्वागत नहीं किया है। कृष्ण चेतना के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्था का उद्देश्य है उन्हें शरण देना और उन्हें भक्ति सेवा में प्रशिक्षण देना। भारत के आध्यात्मिक जीवन को समझने के लिए कई पर्यटक भी भारत आने को उत्सुक रहते हैं और हमारे वृंदावन और नबद्वीप दोनों मंदिरों में मौजूद भक्तों को उन्हें रहने की व्यवस्था करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)