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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 170
 
 
श्लोक  2.25.170 
आमि बोझा वहिमु, तोमा - सबार दुःख हैल ।
तोमा - सबार इच्छाय विना - मूल्ये बिलाइल ॥170॥
 
 
अनुवाद
"आप सभी इस बात से दुखी थे कि मेरा सामान कोई नहीं खरीद रहा है और मुझे ही ले जाना पड़ेगा। इसलिए आपकी ही इच्छा से मैंने बिना पैसे लिए ही सामान बाँट दिया है।"
 
"You were all sad that no one was buying my goods and I had to take them back. So, with your consent, I distributed them free of charge."
तात्पर्य
जब हम पश्चिमी देशों में श्री चैतन्य महाप्रभु के संदेश का प्रचार-प्रसार करना शुरू किया, तो कुछ ऐसा ही घटित हुआ। शुरूआत में हम कम से कम एक वर्ष तक बहुत निराश थे क्योंकि कोई भी इस आंदोलन में मदद करने के लिए आगे नहीं आया, पर श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से, कुछ युवा लड़के 1966 में इस आंदोलन में शामिल हो गए। निःसंदेह हमने श्री चैतन्य महाप्रभु का संदेश बिना किसी मोल-भाव या बिक्री के हरे कृष्ण महामंत्र के रूप में वितरित किया। नतीजतन, यह आंदोलन यूरोपीय और अमेरिकी लड़कों और लड़कियों की सहायता से दुनिया भर में फैल गया है। इसलिए हम पश्चिमी दुनिया के सभी भक्तों पर श्री चैतन्य महाप्रभु का आशीर्वाद देने के लिए प्रार्थना करते हैं जो इस आंदोलन को फैला रहे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)